अदरक खाने के फायदे
कई बीमारियों की दवा है अदरक
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आयरन, कैल्शियम, क्लोरीन व विटामिन से भरपूर।
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अदरक का रस पीने से दिल सम्बंधित बीमारियां नहीं होतीं।
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कोलेस्ट्रोल को कंट्रोल कर रक्त-संचार को ठीक रखता है।
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पेट में दद्र, सर्दी-जुकाम, उल्टी, खांसी, अपच में फायदेमंद।
अदरक को आयुर्वेदिक महा-औषधि के रूप में जाना जाता है। कई वैज्ञानिक शोध इस बात की पुष्टि भी करते हैं। अदरक में शरीर के लिए आवश्यक सभी पोषक तत्व मौजूद होते हैं। ताजा अदरक में 81% पानी, 2.5% प्रोटीन, 1% वसा, 2.5% रेशे और 13% कार्बोहाइड्रेट पाया जाता है। इस लेख को पढ़ कर जाने अदरक के फायदों के बारे में।
अदरक में आयरन, कैल्शियम, आयोडीन, क्लोरीन व विटामिन सहित कई पोषक तत्व मौजूद होते हैं। अदरक को ताजा और सूखा दोनों प्रकार से प्रयोग किया जा सकता है। अदरक एक मजबूत एंटीवायरल भी है। आइए हम आपको अदरक के फायदे के बारे में बताते हैं।
अदरक खाने के फायदे
त्वचा के लिए
अदरक का सेवन करने से त्वचा आकर्षित और चमकदार होती है। सुबह-सुबह खाली पेट एक गिलास गुनगुने पानी के साथ अदरक का टुकडा खाइए। इससे आपकी त्वचा में निखार आएगा और आप जवां दिखेंगे।
खांसी के लिए
खांसी में अदरक बहुत फायदेमंद होता है। खांसी आने पर अदरक के छोटे टुकडे को बराबर मात्रा में शहद के साथ गर्म करके दिन में दो बार सेवन कीजिए। इससे खांसी आना बंद हो जाएगा और गले की खराश भी समाप्त होगी।
भूख की कमी के लिए
अगर भूख लगने में दिक्कत हो रही हो तो अदरक का नियमित सेवन करने से भूख न लगने की समस्या का निजात मिल जाएगा। अदरक को बारीक काटकर, थोडा सा नमक लगाकर दिन में एक बार लगातार आठ दिन तक खाइए। इससे पेट साफ होगा और ज्यादा भूख लगेगी।
हाजमे के लिए
पेट और कब्ज की समस्या के लिए अदरक बहुत फायदेमंद है। अदरक को अजवाइन और नींबू के रस के साथ थोडा सा नमक मिलाकर खाइए। इससे पेट का दर्द ठीक होगा और खट्टी-मीठी डकार आना बंद हो जाएगी।
उल्टी के लिए
अगर बार-बार उल्टी आ रही हो तो अदरक को प्याज के रस के साथ दो चम्मच पिला दीजिए। इससे उल्टी आना बंद हो जाएगी।
सर्दी और जुकाम
सर्दी और जुकाम में अदरक बहुत फायदेमंद है। सर्दी होने पर अदरक की चाय पीने से फायदा होता है। इसके अलावा अदरक के रस को शहद में मिलाकर गर्म करके पीने से फायदा होता है।
कैंसर के लिए
अदरक में कोलेस्ट्राल का स्तर कम करने, खून का थक्का जमने से रोकने, एंटी फंगल और कैंसर के प्रति प्रतिरोधी होने के गुण भी पाए जाते हैं।
अन्य बीमारियां
अदरक को दवा के रूप में भी प्रयोग किया जाता है। अदरक का सेवन करने से गठिया, अर्थराइटिस, साइटिका, गर्दन और रीढ की हड्डियों के रोग (सर्वाइकल स्पांसडिलाइटिस) के इलाज में किया जा सकता है। अदरक महिलाओं में मासिक धर्म की अनियमितता को दूर करने में भी मददगार होता है।
अदरक के अन्य फायदे
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अदरक खाने से मुंह के हानिकारक बैक्टीरिया नष्ट हो जाते हैं।
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अदरक का कोलेस्ट्रोल को भी कंट्रोल करता है जिसके कारण ब्लड सर्कुलेशन ठीक रहता है।
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अदरक का प्रयोग करने से शरीर में खून के थक्के नहीं जमते।
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अदरक का रस और पानी बराबर मात्रा में पीने से दिल सम्बंधित बीमारियां नहीं होतीं।
अदरक की तासीर गर्म होती है। गर्मी के मौसम में अदरक का सेवन नहीं करना चाहिए और यदि आवश्यकता हो तो कम से कम मात्रा में प्रयोग करना चाहिए।
- Disclaimer +
इस जानकारी की सटीकता , समयबद्धता और वास्तविकता सुनिश्चित करने का हर संभव प्रयास किया गया है । इसकी नैतिक जिम्मेदारी लेखक की नहीं है। इस लेख में उपलब्ध सभी साम्रगी केवल पाठकों की जानकारी और ज्ञानवर्धन के लिए दी गई है। हमारा आपसे विनम्र निवेदन है कि किसी भी उपाय को आजमाने से पहले अपने चिकिस्तक से अवश्य संपर्क करें। हमारा उद्येश्य आपको रोचक और ज्ञानवर्धक जानकारी मुहैया कराना मात्र है। आपका चिकिस्तक आपकी सेहत के बारे में बेहतर जानता है और उसकी सलाह का कोई विकल्प नहीं है।
Posted by D.R. Singh on Saturday 9 April 2016
सोयाबीन के औषधीय महत्त्व
सोयाबीन परिचय

सोयाबीन परिचय
सोयाबीन एक बहुउपयोगी द्विदल फ़सल है। यह मुख्य रूप से रबी की फ़सल हैं लेकिन इसकी खेती अब खरीफ काल में भी करना आसान है। इसका उपयोग तेल निकालने, प्रोटीनयुक्त पदार्थ, प्रोटीन व विविध मानव व पशु आहार आदि में होता है, क्योंकि अन्य दलहनों या तिलहनों की तुलना में इसमें प्रोटीन एवं तेल का अंश बहुत अधिक होता है अतः सोया, दूध एवं सोया आहार इसी कारण विशेष प्रचलित हो रहे हैं। अब रिफाइण्ड सोयाबीन के तेल की खपत मूंगफली एवं सरसों के तेल के पश्चात सबसे अधिक होने लगी है। इसके सभी उत्पाद स्वास्थ्य के लिए गुणकारी माने गए हैं। परन्तु इससे उत्पन्न दूध और दही देखने में और खाने में दूध और दूध की वस्तुओं की तरह ही होते हैं परन्तु इसका मूल्य दूध के मूल्य का सोलहवां भाग है। उपकारिता की दृष्टि से भी सोयाबीन का स्थान दूध से किसी तरह कम नहीं हैं। संसार में सोयाबीन के समान पुष्टिकारक कोई अन्य खाद्य मिलना कठिन है। यह विभिन्न विटामिन, खनिज लवण और उच्च श्रेणी के प्रोटीन, शर्करा तथा चर्बी जातीय खाद्यों से समृद्ध है। सोयाबीन गुणवत्ता की दृष्टी से भी सभी खाद्यान्नों से बढ़कर है। इन्हीं सब विशेषताओं के कारण सोयाबीन को जादुई बीज भी कहा जाता है।सोयाबीन का वैज्ञानिक नाम ग्लाईसिन मैक्स (Glycine max) हैं। यह शिम्बी कुल और सेम जाति का धान्य हैं। अंग्रेज़ी में इसे सोयाबीन तथा हिंदी में सोया, शेव दाना भट्वास कहा जाता हैं। यह वसा हृदय रोग में हितकर हैं और घी व माखन के सामान रोग प्रतिरोधक हैं।
सोयाप्रोटीन के एमीगेमिनो अम्ल की संरचना पशु प्रोटीन के समकक्ष होती हैं। अतः मनुष्य के पोषण के लिए सोयाबीन उच्च गुणवत्ता युक्त प्रोटीन का एक अच्छा स्त्रोत हैं। कार्बोहाइडेंट के रूप में आहार रेशा, शर्करा, रैफीनोस एवं स्टाकियोज होता है जो कि पेट में पाए जाने वाले सूक्ष्मजीवों के लिए लाभप्रद होता हैं। सोयाबीन तेल में लिनोलिक अम्ल एवं लिनालेनिक अम्ल प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं। ये अम्ल मानव शरीर के लिए अतिआवश्यक होते हैं। इसके अलावा सोयाबीन में आइसोफ्लावोन, लेसिथिन और फाइटोस्टेरॉल के रूप में कुछ अन्य स्वास्थवर्धक उपयोगी घटक भी होते हैं।
सोयाबीन न केवल प्रोटीन का एक उत्कृष्ट स्रोत है बल्कि कई शारीरिक क्रियाओं को भी प्रभावित करता है। विभिन्न शोधकर्ताओं द्वारा सोया प्रोटीन का प्लाज्मा लिपिड एवं कोलेस्टेरॉल की मात्रा पर पड़ने वाले प्रभाव का अध्ययन किया गया है और यह पाया गया है कि सोया प्रोटीन मानव रक्त में कोलेस्टेरॉल की मात्रा कम करने में सहायक होता है।
सोयाबीन के प्रकार
सोयाबीन कई प्रकार के होते हैं - लाल, पीले, बादामी, काले आदि रंगों के सोयाबीन बाज़ार में बिकते है। मनुष्य केवल हरे तथा सफ़ेद रंग के सोयाबीन खाद्य के रूप में ग्रहण करते हैं।
प्रोटीन का प्रमुख स्रोत
सोयाबीन पोषक तत्वों से परिपूर्ण एवं पोषण की खान के रूप में जाना जाता है इसलिये इसे सुनहरे बीन की उपाधि दी गई है। सोयाबीन प्रोटीन का सर्वोतम स्रोत हैं। इसमें प्रोटीन के अन्य सभी उपलब्ध स्रोतों की तुलना में सबसे अधिक लगभग 43.2% अच्छी गुणवत्ता की प्रोटीन एवं 20% तेल की मात्रा होती है। इस कारण इस स्वास्थ्यवर्धक आहार को "प्रोटीनों का राजा" कहा जाता हैं। सोयाबीन का प्रोटीन सुपाच्य होता हैं जिसके कारण यह बालक, वृद्ध, कमज़ोर, रुग्ण, गर्भवती और प्रसूति महिलाओ के लिए बहुत उपयोगी हैं। 100 ग्राम सोयाबीन में जितनी प्रोटीन होती हैं, उतना ही प्रोटीन पाने के लिए 200 ग्राम पिश्ते की गिरी या 1200 ग्राम गाय-भैंस का दूध या 7-8 अंडे या 300 ग्राम हड्डी विहीन मांस की आवश्यकता पड़ती हैं। इसके अन्दर अधिक मात्रा में लोह रहने के कारण रक्तालापता में यह विशेष रूप से हितकर है। सोयाबीन विभिन्न दुर्लभ विटामिनों से समृद्ध है, इसलिय यह स्मरण शक्ति बढ़ता है, स्नायुओं को शांत रखता है, चिड़चिड़े स्वभाव को दूर रखता है, देह स्वस्थ रखता है, यौवन दीर्घ और लम्बी आयु प्रदान करता है। यह कैल्सियम और फोस्फोरस का एक मूल्य प्राप्ति स्थान है।
हजारों वर्ष से चीन, जापान, मंचूरिया, मंगोलिया आदि में सोयाबीन का सेवन होता आ रहा है। लोगों का मानना है कि सोयाबीन खाने से वज़न और शरीर में शीग्रता से वृद्धि होती है, देह का रंग उज्ज्वल होता है, तथा बदन स्वस्थ और सुदोठित हो उठता है। जापान में ऐसा कोई ग्राम नहीं है जहाँ पर सोयाबीन के दूध, दही तथा पनीर की दुकान नहीं मिलती हों।सोयाबीन पोषक तत्वों से परिपूर्ण एवं पोषण की खान के रूप में जाना जाता है इसलिये इसे सुनहरे बीन की उपाधि दी गई है। सोयाबीन प्रोटीन का सर्वोतम स्रोत हैं। इसमें प्रोटीन के अन्य सभी उपलब्ध स्रोतों की तुलना में सबसे अधिक लगभग 43.2% अच्छी गुणवत्ता की प्रोटीन एवं 20% तेल की मात्रा होती है। इस कारण इस स्वास्थ्यवर्धक आहार को "प्रोटीनों का राजा" कहा जाता हैं। सोयाबीन का प्रोटीन सुपाच्य होता हैं जिसके कारण यह बालक, वृद्ध, कमज़ोर, रुग्ण, गर्भवती और प्रसूति महिलाओ के लिए बहुत उपयोगी हैं। 100 ग्राम सोयाबीन में जितनी प्रोटीन होती हैं, उतना ही प्रोटीन पाने के लिए 200 ग्राम पिश्ते की गिरी या 1200 ग्राम गाय-भैंस का दूध या 7-8 अंडे या 300 ग्राम हड्डी विहीन मांस की आवश्यकता पड़ती हैं। इसके अन्दर अधिक मात्रा में लोह रहने के कारण रक्तालापता में यह विशेष रूप से हितकर है। सोयाबीन विभिन्न दुर्लभ विटामिनों से समृद्ध है, इसलिय यह स्मरण शक्ति बढ़ता है, स्नायुओं को शांत रखता है, चिड़चिड़े स्वभाव को दूर रखता है, देह स्वस्थ रखता है, यौवन दीर्घ और लम्बी आयु प्रदान करता है। यह कैल्सियम और फोस्फोरस का एक मूल्य प्राप्ति स्थान है।
साधारणतः ऐसा सोचा जाता है कि सोयाबीन बहुत मुश्किल से पचने वाला खाद्य है परन्तु ऐसा सोचना व्यर्थ है। जब यह ठीक तरह से पकाया जाता है तब यह अन्य किसी भी खाद्य के समान सुपाच्य हो जाता है।
औषधीय महत्त्व
सोयाबीन में उपस्थित प्रोटीन व आहरिक रेशे पाये जाने के कारण इससे रक्त में ग्लूकोज की मात्रा कम होती है जिससे ख़ून की कमी होने से रोकता है तथा सोयाबीन में आयरन की मात्रा अधिक होने के कारण यह एनीमिया को भी नियन्त्रित करता है।
सोयाबीन में पाई जाने वाली प्रोटीन से हमारे शरीर के रक्त में हानिकारक कोलेस्ट्रोल की मात्रा भी कम होती है। जिससे हृदय रोग की संभावनाये कम होती है। डॉक्टरों का मानना है कि दवाओं से कोलेस्ट्राल पर काबू पाने से बेहतर है कि आप अपना खान-पान थोडा बदलें। जैसे- सोया प्रोटीन एलडीएल की मात्रा 14 फीसदी तक घटा सकते हैं। हर दिन 2 गिलास सोया का दूध पीना ही इसके लियें काफ़ी है। इसके अलावा जौ के साबुत दानों में मौजूद रेशे जो कि दालों में भी मिलते हैं, एलडीएल की समस्या से निजात दिलाने में सहायक है।सोयाबीन में उपस्थित प्रोटीन व आहरिक रेशे पाये जाने के कारण इससे रक्त में ग्लूकोज की मात्रा कम होती है जिससे ख़ून की कमी होने से रोकता है तथा सोयाबीन में आयरन की मात्रा अधिक होने के कारण यह एनीमिया को भी नियन्त्रित करता है।
सोयाबीन दिल के स्वास्थ्य का पोषक है। रोजाना 25 ग्राम सोया प्रोटीन को खाने से लाभ होता है। खोजों में यह पाया गया है कि सोयाबीन रक्तवसा को घटाता है और सीएचडी के वृद्धि के खतरे को बढ़ने नहीं देता। जो लोग रोजाना औसतन 47 ग्राम सोया प्रोटीन खाते हैं, उनकी पूर्ण रक्तवसा में 9 प्रतिशत कमी होती है। एलडीएल ख़राब कोलेस्ट्रॉल का स्तर प्राय: 13 प्रतिशत कम हुआ। एचडीएल अच्छा कोलेस्ट्रॉल मगर बढ़ा और ट्राइग्लीसेराइड्स घट कर 10 से 11 प्रतिशत कम हुआ। जिनके रक्तवसा के माप शुरू में ही अपेक्षाकृत अधिक थे, उनको आश्चर्यजनक रूप से लाभ हुआ।
कैंसर के रोग में सोयाबीन का उपयोग
सोयाबीन में पाये जाने वाले आइसोफ़्लोविन रसायन के कारण महिलाओं से सम्बन्धित रोग व स्तन कैंसर से बचाव करता है।
सोयाबीन में कुछ ऐसे तत्त्व पाये जाते हैं, जो कैंसर से बचाव का कार्य करते है। क्योंकि इसमें कायटोकेमिकल्स पाये जाते हैं, ख़ासकर फायटोएस्ट्रोजन और 950 प्रकार के हार्मोन्स। यह सब बहुत लाभदायक है। इन तत्त्वों के कारण स्तन कैंसर एवं एंडोमिट्रियोसिस जैसी बीमारियों से बचाव होता है। यह देखा गया है कि इन तत्त्वों के कारण कैंसर के टयूमर बढ़ते नहीं है और उनका आकार भी घट जाता है। सोयाबीन के उपयोग से कैंसर में 30 से 45 प्रतिशत की कमी देखी गई है।
अध्ययनों से पता चला है कि सोयायुक्त भोजन लेने से ब्रेस्ट (स्तन) कैंसर का ख़तरा कम हो जाता है। महिलाओं की सेहत के लिये सोयाबीन बेहद लाभदायक आहार है। ओमेगा 3 नामक वसा युक्त अम्ल महिलाओं में जन्म से पहले से ही उनमें स्तन कैंसर से बचाव करना आरम्भ कर देता है। जो महिलायें गर्भावस्था तथा स्तनपान के समय ओमेगा 3 अम्ल की प्रचुरता युक्त भोजन करती है, उनकी संतानों कें स्तन कैंसर की आशंका कम होती है। ओमेगा-3 अखरोट, सोयाबीन व मछलियों में पाया जाता है। इससे दिल के रोग होने की आंशका में काफ़ी कमी आती है। इसलिये महिलाओं को गर्भावस्था व स्तनपान कराते समय अखरोट और सोयाबीन का सेवन करते रहना चाहियें।
कैंसर के रोगी जो केमोथेरेपी, रेडिएशन कराते है उन पर उनके दुष्प्रभाव-असहनीय दर्द, ख़ून बहना, ख़ून की कमी, थकान, वजन घटना, जी मिचलाना, उल्टी, दस्त, कब्ज, भूख की कमी, कमज़ोरी, सिर के बाल गिरना, निराशा, रोग की असाध्यता से मानसिक रूप से पड़ते है।
सोयाबीन कई तरह के रोगों के लिए है फ़ायदेमंद
एक शोध के अनुसार सोयाबीन में पाए जाने वाले एक रसायनिक पदार्थ का सेवन करने से ऐसे मरीज़ो को फ़ायदा हो सकता है जिन्हें दिल का दौरा पड़ चुका है. हाँगकाँग विश्वविद्यालय की टीम का कहना है कि सोयाबीन में पाए जाने वाले आइसोफ़लेवोन नामक रसायनिक पदार्थ कॉलेस्ट्रॉल से लड़ने वाली स्टेटिन के समकक्ष है. यूरोपीय हृदय पत्रिका के शोध के अनुसार आइसोफ़लेवोन धमनियों में ख़ून के प्रवाह को बेहतर करने में मदद करता है. कैंसर से बचता है पिछले अध्ययनों में संभावना व्यक्त की गई था कि सोयाबीन का सेवन छाती और प्रोस्टेट कैंसर से बचने मे मदद करता है और कॉलेस्ट्रॉल भी कम करता है. सोयाबिन में पाया जाने वाला आइसोफ़लेवोन हृदय की बीमारी के ख़तरे को कम करता है और उस कोशिका को बढ़ने से रोकता है जो धमनियों में ख़ून के बहाव में रूकावट पैदा करती है. शोधकर्ताओं ने ताज़ा परीक्षण में 102 मरीज़ों को शामिल किया और शामिल किए गए सभी लोगों को ख़ून का थक्का जमने के कारण दिल का दौरा पड़ चुका था और वे हृदय की बीमारी से ग्रसित थे. शोधकर्ताओं ने इन मरीज़ों को दो समूहों में बाँटा. एक समूह को आइसोफ़लेवोन जबकि दूसरे को पलेसेबो बारह सप्ताहों तक दिया. शोधकताओं ने पाया कि जिन मरीज़ों ने आइसोफ़लेवोन का सेवन किया था उनकी हालत में बेहतरी देखी गई. शोधकर्ता प्रोफ़ेसर हंग फेट सी का कहना था, "शोध इस बात की तरफ़ इशारा करते हैं कि आइसोफ़लेवोन इनडोथेलियल की ख़राबी को ख़त्म करता है." और अध्ययन की ज़रूरत हालाँकि उनका कहना था कि अभी यह जल्दबाज़ी होगी के मरीज़ो को आइसोफ़लेवोन के सेवन करने की सलाह दी जाए.
लेकिन उनका कहना था, "जिनके खाने में आइसोफ़लेवोन की मात्रा ज़्यादा होगी उन लोगों में दिल का दौरा पड़ने के ख़तरे कम होंगे." ग़ौरतलब है कि आइसोफ़लेवोन फ़ाइटोइस्ट्रोजीन के अंतर्गत आता है जो प्राकृतिक रूप से पाए जाने वाले ओएस्ट्रोजन की नक़ल करता. ओएस्ट्रोजन हृदय की बीमारी के ख़तरे से रक्षा करता है. द स्ट्रोक ऐसोसियेशन के डाक्टर पेटर कोलेमन का कहना है, "शोध से जो पता चल रहा है वो बड़ा महत्वपूर्ण और दिलचसप है कि आइसोफ़लेवोन के सेवन से दिल का दौरा पड़ चुके मरीज़ों के लिए फ़ायदेमंद हो सकता है." उनका कहना था कि अभी ये शोध बहत कम लोगों पर किया गया है और इस सिलसिले में और अध्ययन की ज़रूरत है.
सोयाबीन: विविध उपयोग
सोयाबीन अर्थात ग्लाइसिन मैक्स दलहनी कुल की तिलहनी फसल है। इसे एक चमत्कारी फसल की संज्ञा दी गई है क्योकि इसके दाने में 40-42 प्रतिशत उच्च गुणवत्ता वाली प्रोटीन और 18-20 प्रतिशत तेल के अलावा 20.9 प्रतिशत कार्बोहाइड्रेट, 0.24 प्रतिशत कैल्शियम, 11.5 प्रतिशत फास्फोरस व 11.5 प्रतिशत लोहा पाया जाता है। सोयाबीन में 5 प्रतिशत लाइसिन नामक अमीनो अम्ल पाया जाता है, जबकि अधिकतर धान्य फसलों में इसकी कमी पायी जाती है। प्रचुर मात्रा में विटामिन पाये जाने के कारण एन्टीबाइटिक दवा बनाने के लिए यह विशेष उपयुक्त है । प्रोटीन व तेल की अधिकता के कारण इसका उपयोग घरेलू एंव औद्योगिक स्तर पर किया जाता है। सोयाबीन ऐसा खाद्य पदार्थ है जो लगभग गाय के दूध के समान पूर्ण आहार माना जाता है । इससे दूध, दही तथा अन्य खाद्य साम्रगी तैयार की जाती है। बीज में स्टार्च की कम मात्रा तथा प्रोटीन की अधिकता होने के कारण मधुमेह रोगियों के लिए यह अत्यंत लाभप्रद खाद्य पदार्थ हैं। इसके अलावा वनस्पति तेल-घी, साबुन, छपाई की स्याही, प्रसाधन सामग्री, ग्लिसरीन, औषधियाँ आदि बनाई जाती हैं। सोयाबीन की खली और भूसा मूर्गियों एंव जानवरों के लिए सर्वोत्तम भोजन है। दलहनी फसल होने के कारण इसकी जड़ों में ग्रंथियाँ पाई जाती हैं जो जिनमे वायुमंडलीय नत्रजन संस्थापित करने की क्षमता होती हैं जिससे भूमि की उर्वरता बढ़ती है। सोयाबीन का विविध प्रयोग एवं अनेक विशेषताएँ होने के कारण इसे मिरेकल क्राप और चमत्कारी फली कहा जाता हैं।सोयाबीन की दाल की उपयोगिता अधिक है । इससे तरह-तरह के व्यंजन बनते है । परन्तु अभी भी भारतीय घरो में सोयाबीन के उत्पाद अधिक प्रचलित नहीं हुए है ।
मूँगफली एवं सोयाबीन के पोषक तत्वो का तुलनात्मक विवरण
विवरण सोयाबीन (प्रतिशत) मूँगफली (प्रतिशत)
जल 8.1 7.9
प्रोटीन 43.2 2.7
वसा 19.5 40.1
कार्बोहाइड्रेट 20.9 20.3
खनिज 4.6 1.9
फॉस्फ़ोरस 0.69 0.39
कैल्शियम 0.24 0.05
लोह (मिग्रा) 11.5 1.6
कैलोरी भेल्यू 451 549
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इस जानकारी की सटीकता , समयबद्धता और वास्तविकता सुनिश्चित करने का हर संभव प्रयास किया गया है । इसकी नैतिक जिम्मेदारी लेखक की नहीं है। इस लेख में उपलब्ध सभी साम्रगी केवल पाठकों की जानकारी और ज्ञानवर्धन के लिए दी गई है। हमारा आपसे विनम्र निवेदन है कि किसी भी उपाय को आजमाने से पहले अपने चिकिस्तक से अवश्य संपर्क करें। हमारा उद्येश्य आपको रोचक और ज्ञानवर्धक जानकारी मुहैया कराना मात्र है। आपका चिकिस्तक आपकी सेहत के बारे में बेहतर जानता है और उसकी सलाह का कोई विकल्प नहीं है।
Posted by D.R. Singh on Saturday 9 April 2016
चाय के फ़ायदे और नुक़सान
चाय (Tea) का विवरण
चाय (Tea) एक महत्त्वपूर्ण पेय पदार्थ है और संसार के अधिकांश लोग इसे पसन्द करते हैं। चाय मुलायम एवं नयी पत्ती, बन्द वानस्पतिक कली आदि से तैयार की जाती है। चाय में मुख्यतः कैफ़ीन का अंश पाया जाता है। इसकी ताज़ी पत्तियों में टैनिन की मात्रा 25.1% पायी जाती है, जबकि संसाधित पत्तियों में टैनिन की मात्रा 13.3% तक होती है। सर्वोत्तम चाय कलियों से बनायी जाती है। चाय के लिए न्यूनतम वर्षा 125 से 150 सेमी होना चाहिए तथा तापमान 21°C से 27°C तक उपयुक्त होता है। विश्व में चाय के उत्पादन में भारत का पहला स्थान है। विश्व उत्पादन का 27 प्रतिशत और विश्व के निर्यात का 11 प्रतिशत भारत से प्राप्त होता है
इतिहास
चाय के पौधे का उत्पादन भारत में पहली बार सन् 1834 में अंग्रेज़ सरकार द्वारा परीक्षण के रूप में व्यापारिक पैमाने पर किया गया था। यद्यपि जंगली अवस्था में यह असम में पहले से ही पैदा होती थी। इंग्लैण्ड को इसका निर्यात असम की चाय कम्पनी द्वारा किया गया। सन् 1815 में कुछ अंग्रेज़ यात्रियों का ध्यान असम में उगने वाली चाय की झाड़ियों पर गया, जिससे स्थानीय क़बाइली लोग एक पेय बनाकर पीते थे। भारत के गवर्नर-जनरल लॉर्ड बैंटिक ने 1834 में चाय की परंपरा भारत में शुरू करने और उसका उत्पादन करने की संभावना तलाश करने के लिए एक समिति का गठन किया। इसके बाद 1835 में असम में चाय के बाग़ लगाए गए। कहते हैं कि एक दिन चीन के सम्राट 'शैन नुंग' के सामने रखे गर्म पानी के प्याले में, कुछ सूखी पत्तियाँ आकर गिरीं, जिनसे पानी में रंग आया और जब उन्होंने उसकी चुस्की ली तो उन्हें उसका स्वाद बहुत पसंद आया। बस यहीं से शुरू होता है चाय का सफ़र। ये बात ईसा से 2737 साल पहले की है। सन् 350 में चाय पीने की परंपरा का पहला उल्लेख मिलता है। सन् 1610 में डच व्यापारी चीन से चाययूरोप ले गए और धीरे-धीरे ये समूची दुनिया का प्रिय पेय बन गया।
चाय के प्रकार
मोटे तौर पर चाय दो तरह की होती है :
प्रोसेस्ड या सीटीसी (कट, टीयर और कर्ल) या आम चाय
हरी चाय (प्राकृतिक चाय)।
सीटीसी चाय (आम चाय)
यह विभिन्न कंपनी के उत्पादों के तहत बिकने वाली दानेदार चाय होती है, जो आमतौर पर घर, रेस्तरां और होटल आदि में इस्तेमाल की जाती है। इसमें पत्तों को तोड़कर कर्ल (मोड़ना) किया जाता है। फिर सुखाकर दानों का रूप दिया जाता है। इस प्रक्रिया में कुछ बदलाव आते हैं। इससे चाय में स्वाद और महक बढ़ जाती है। लेकिन यह हरी चाय जितनी अच्छी नहीं बनती और न ही उतनी फ़ायदेमंद।
हरी चाय (ग्रीन टी)
यह चाय के पौधे के ऊपर के कच्चे पत्ते से बनती है। सीधे पत्तों को तोड़कर भी चाय बना सकते हैं। इसमें प्रति आक्सीकारक (एंटी-ऑक्सिडेंट) सबसे ज़्यादा होते हैं। हरी चाय काफ़ी फ़ायदेमंद होती है, ख़ासकर अगर बिना दूध और चीनी के पी जाए। इसमें ऊर्जा (कैलरी) भी नहीं होतीं। इसी हरी चाय से आयुर्वेदिक (हर्बल) व कार्बनिक (ऑर्गेनिक) आदि चाय तैयार की जाती है।
चाय के कुछ अन्य प्रकार जो बाजार में उपलब्ध हैं -
आयुर्वेदिक चाय (हर्बल टी)
हरी चाय में कुछ जड़ी-बूटियां मसलन तुलसी, अश्वगंधा, इलायची, दालचीनी आदि मिला देते हैं तो आयुर्वेदिक चाय तैयार होती है। इसमें कोई एक या तीन-चार हर्ब मिलाकर भी डाल सकते हैं। यह बाज़ार में तैयार पैकेट में भी मिलती है। यह सर्दी-खांसी में काफ़ी फ़ायदेमंद होती है, इसलिए लोग दवा की तरह भी इसका प्रयोग करते हैं।
जैविक चाय (ऑर्गेनिक टी)
जिस चाय के पौधों में कीटनाशक (पेस्टिसाइड) और रासायनिक उर्वरक (फर्टिलाइजर) आदि नहीं डाले जाते, उसे ऑर्गेनिक चाय या जैविक चाय कहा जाता है। यह सेहत के लिए ज़्यादा फ़ायदेमंद है।
सफ़ेद चाय (वाइट टी)
कुछ दिनों की कोमल पत्तियों से इसे तैयार किया जाता है। इसका हल्का मीठा स्वाद काफ़ी अच्छा होता है। इसमें कैफ़ीन सबसे कम और प्रति आक्सीकारक (एंटी-ऑक्सिडेंट) सबसे ज़्यादा होते हैं। इसके एक कप में सिर्फ़ 15 मिलीग्राम कैफ़ीन होता है, जबकि काली चाय (ब्लैक टी) के एक कप में 40 और हरी चाय में 20 मि.ग्रा. कैफ़ीन होता है।
काली चाय (ब्लैक टी)
काली चाय
कोई भी चाय दूध व चीनी मिलाए बिना पी जाए तो उसे काली चाय कहते हैं। हरी चाय या आयुर्वेदिक चाय को तो आमतौर पर दूध मिलाए बिना ही पिया जाता है। लेकिन किसी भी तरह की चाय को काली चाय के रूप में पीना ही सबसे सेहतमंद है। तभी चाय का असली फ़ायदा मिलता है।
तुरंत चाय (इंस्टेंट टी)
इस श्रेणी में चाय के छोटे-छोटे बैग आते हैं, यानी पानी में डालो और तुरंत चाय तैयार। चाय के बैग में टैनिक एसिड होता है। इसमें विषाणु विरोधी (एंटी-वायरल) और जीवाणु विरोधी (एंटी-बैक्टीरियल) गुण होते हैं। इन्हीं गुणों की वजह से चाय के बैग को कॉस्मेटिक्स आदि में भी प्रयोग किया जाता है।
नीबू की चाय (लेमन चाय)
नीबू की चाय सेहत के लिए अच्छी होती है, क्योंकि चाय के जिन प्रति आक्सीकारक (एंटी-ऑक्सिडेंट्स) को शरीर अवशोषित नहीं कर पाता, नीबू डालने से वे भी अवशोषित हो जाते हैं।
मशीन वाली चाय
रेस्तरां, दफ़्तर, रेलवे स्टेशन, एयरपोर्ट आदि पर आमतौर पर मशीन वाली चाय मिलती है। इस चाय का कोई फ़ायदा नहीं होता क्योंकि इसमें कुछ भी प्राकृतिक अवस्था में नहीं होता।
अन्य चाय
आजकल स्ट्रेस रीलिविंग (तनाव रहित), रिजूविनेटिंग (कायाकल्प), स्लिमिंग टी व आइस टी भी खूब चलन में हैं। इनमें कई तरह की जड़ी-बूटी आदि मिलाई जाती हैं। मसलन, भ्रमी रिलेक्स करता है तो दालचीनी ताजगी प्रदान करती है और तुलसीहमारी प्रतिरक्षा प्रणाली को मज़बूत करती है। इसी तरह स्लिमिंग टी में भी ऐसे तत्त्व होते हैं, जो वज़न कम करने में मदद करते हैं। इनसे चयापचय दर (मेटाबॉलिक रेट) थोड़ा बढ़ जाता है, लेकिन यह सहारा भर है। सिर्फ़ इसके सहारे वज़न कम नहीं हो सकता। आइस टी में चीनी काफ़ी होती है, इसलिए इसे पीने का कोई फ़ायदा नहीं है।
चाय के फ़ायदे
चाय में कैफ़ीन और टैनिन होते हैं, जो उत्तेजक औषधि होते हैं। इनसे शरीर में फुर्ती का अहसास होता है।
चाय में मौजूद एल-थियेनाइन नामक अमीनो-एसिड दिमाग़ को ज़्यादा सक्रिय लेकिन शांत रखता है।
चाय में एंटीजन होते हैं, जो इसे एंटी-बैक्टीरियल क्षमता प्रदान करते हैं।
इसमें मौजूद एंटी-ऑक्सिडेंट तत्व शरीर की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाते हैं और कई बीमारियों से बचाव करते हैं।
चाय में फ्लोराइड होता है, जो हड्डियों को मज़बूत करता है और दांतों में कीड़ा लगने से रोकता है।
चाय के नुक़सान
दिन भर में तीन कप से ज़्यादा पीने से एसिडिटी हो सकती है।
लौह तत्त्वों को अवशोषित करने की शरीर की क्षमता को कम कर देती है।
कैफ़ीन होने के कारण चाय पीने की लत लग सकती है।
ज़्यादा पीने से खुश्की आ सकती है।
पाचन में दिक्कत हो सकती है।
दांतों पर दाग़ आ सकते हैं लेकिन कॉफ़ी से ज़्यादा दाग़ आते हैं।
देर रात पीने से नींद न आने की समस्या हो सकती है।
चाय की औषधीय महत्ता
चाय को कैंसर, हाई कॉलेस्ट्रॉल, एलर्जी, यकृत और दिल की बीमारियों में फ़ायदेमंद माना जाता है। कई शोध कहते हैं कि चाय कैंसर व ऑर्थराइटस (जोड़ों का दर्द) की रोकथाम में भूमिका निभाती है और बैड कॉलेस्ट्रॉल (एल. डी. एल.) को नियंत्रित करती है। साथ ही,हृदय और यकृत संबंधी समस्याओं को भी कम करती है।
चाय के गुण
चाय की पत्तियों के पानी को गुलाब के पौधे की जड़ों में डालना चाहिए।
चाय की पत्तियों को पानी में उबाल कर बाल धोने से चमक आ जाती है।
एक लीटर उबले पानी में पांच चाय के बैग डालें और पांच मिनट के लिए छोड़ दें। इसमें थोड़ी देर के लिए पैर डालकर बैठे रहें। पैरों को काफ़ी राहत मिलती है।
चाय के दो बैग को ठंडे पानी में डुबोकर निचोड़ लें। फिर दोनों आंखों को बंद कर लें और उनके ऊपर टी बैग्स रखकर कुछ देर के लिए शांति से लेट जाएं। इससे आंखों की सूजन और थकान उतर जाएगी।
शरीर के किसी भाग में सूजन हो जाए तो उस पर गर्म पानी में भिगोकर चाय के बैग रखें। इससे दर्द कम होगा और रक्त परिसंचरण सामान्य हो जाएगा।
गर्म पानी में भीगे हुए चाय के बैग को रखने से दांत के दर्द में तुरंत आराम मिलता है।
चाय बनाने का सही तरीक़ा
ताज़ा पानी लें। उसे एक उबाल आने तक उबालें। पानी को आधे मिनट से ज़्यादा नहीं उबालें। एक सूखे बर्तन में चाय पत्ती डालें। इसके बाद बर्तन में पानी उड़ेल दें। पांच-सात मिनट के लिए बर्तन को ढक दें। इसके बाद कप में छान लें। स्वाद के मुताबिक दूध और चीनी मिलाएं। एक कप चाय बनाने के लिए आधा चम्मच चाय पत्ती काफ़ी होती है। चाय पत्ती, दूध और चीनी को एक साथ उबालकर चाय बनाने का तरीक़ा सही नहीं है। इससे चाय के सारे फ़ायदे खत्म हो जाते हैं। इससे चाय काफ़ी कड़क भी हो जाती है और उसमें कड़वापन आ जाता है।
कब पिएं
यूं तो चाय कभी भी पी सकते हैं लेकिन सोने से ठीक पहले चाय पीने से बचना चाहिए। दरअसल, रात को सोने और आराम करने सेआंत ताज़ा होती है। ऐसे में सुबह उठकर सबसे पहले चाय पीना सही नहीं है। देर रात में चाय पीने से नींद आने में दिक्कत हो सकती है।
साथ में क्या खाएं
जिन लोगों को एसिडिटी की दिक्कत है, उन्हें ख़ाली चाय नहीं पीनी चाहिए। साथ में एक-दो बिस्कुट लें।
हरी चाय आयुर्वेदिक पेय है, इसलिए इसे ख़ाली ही पीना बेहतर है। साथ में कुछ न खाएं तो इसका गुणकारी असर ज़्यादा होता है।
कितने कप पिएं
बिना दूध और चीनी की आयुर्वेदिक चाय तो कितनी बार भी पी सकते हैं। लेकिन दूध-चीनी डालकर और सभी चीज़ें एक साथ उबालकर बनाई गई चाय तीन कप से ज़्यादा नहीं पीनी चाहिए।
कितनी गर्म पिएं
चाय को कप में डालने के 2-3 मिनट बाद पीना ठीक रहता है। वैसे जीभ खुद एक संवेदी अंग है। चाय के ज़्यादा गर्म होने पर उसमें जलन हो जाती है और हमें पता चल जाता है कि चाय ज़्यादा गर्म है।
रखी हुई चाय न पिएं
चाय ताज़ा बनाकर ही पीनी चाहिए। आधे घंटे से ज़्यादा रखी हुई चाय को ठंडा या दोबारा गर्म करके नहीं पीना चाहिए। इसी तरह एक ही पत्ती को बार-बार उबालकर पीना और भी नुक़सानदेह है। अक्सर ढाबों और गली-मुहल्ले की चाय की दुकानों पर चाय बनाने वाले बर्तन में पुरानी ही पत्ती में और पत्ती डालकर चाय बनाई जाती है। इससे चाय में नुक़सानदायकतत्त्व बनने लगते हैं।
- Disclaimer +
इस जानकारी की सटीकता , समयबद्धता और वास्तविकता सुनिश्चित करने का हर संभव प्रयास किया गया है । इसकी नैतिक जिम्मेदारी लेखक की नहीं है। इस लेख में उपलब्ध सभी साम्रगी केवल पाठकों की जानकारी और ज्ञानवर्धन के लिए दी गई है। हमारा आपसे विनम्र निवेदन है कि किसी भी उपाय को आजमाने से पहले अपने चिकिस्तक से अवश्य संपर्क करें। हमारा उद्येश्य आपको रोचक और ज्ञानवर्धक जानकारी मुहैया कराना मात्र है। आपका चिकिस्तक आपकी सेहत के बारे में बेहतर जानता है और उसकी सलाह का कोई विकल्प नहीं है।
Posted by D.R. Singh on Saturday 9 April 2016
गठिया रोग व उसका उपचार
घुटनों के गठिया रोग का उपचार

ओस्टियो आर्थराईटिस एक आम प्रकार का घुटनों का आर्थराईटिस होता है और इसे जोड़ों का अपकर्षक रोग भी कहा जाता है। घुटनों का संधिशोथ चबनी हड्डी की क्रमिक घिसाई के कारण होता है। घुटनों का संधिशोथ आम तौर से 50 वर्षों से अधिक आयु के रोगियों को अपना शिकार बनता है। और यह रोग उनमें अधिक पाया जाता है जिनका वज़न आवश्यकता से अधिक होता है। यह रोग अनुवांशिक भी होता है, मतलब कि पीढ़ी दर पीढ़ी जारी रहता है। घुटनों के संधिशोथ के अन्य कारण हैं, घुटने में चोट, अस्थिबंध को हानि, और जोड़ के आसपास की हड्डी का टूटना।
घुटनों के संधिशोथ के लक्षण
घुटनों के संधिशोथ के लक्षण संधिशोथ की अवस्था की बदतरी के साथ उजागर होते जाते हैं। लेकिन मज़े की बात यह है कि लक्षण समय के साथ बढ़ते नहीं हैं। रोगी अक्सर अच्छे और बुरे समय के बारे में बात करते हैं, या मौसम के साथ लक्षणों में बदलाव महसूस करते हैं। घुटनों के आर्थराइटिस के आम लक्षण इस प्रकार हैं।
१ - गतिविधि के कारण पीड़ा।२ - घुटनों में अकड़न।3 - जोड़ों में सूजन।4 - "जोड़ जवाब दे जाएगा" का एहसास।5 - जोड़ों की विकृति।
घुटनों के आर्थराइटिस के उपचार की शुरुआत शारीरिक जांच और एक्स रे से करनी चाहिए और अगर आवश्यकता पड़े तो ऑपरेशन भी किया जा सकता है। हर रोगी पर एक ही तरह का इलाज कारगर नहीं होता, और अपने लिए सही इलाज की सलाह अपने चिकित्सक से लेना ज़रूरी होता है।
घुटनों के आर्थ राइटिस के उपचार के लिए कुछ विकल्प नीचे दिए गए हैं।
वज़न कम करना
घुटनों के आर्थराइटिस के उपचार के लिए कदाचित यह एक अति महत्वपूर्ण पर कम प्रयोग में लाया जानेवाला एक अचूक तरीका है। जोड़ों को जितना कम वज़न उठाना पड़े, उतनी ही कोई कार्य करते समय जोड़ों में पीड़ा कम होती है।अपनी कुछ गतिविधियाँ कम करने या उनपर नियंत्रण करने से, और व्यायाम के नए तरीकों के बारे में जानने से काफी सहायता मिल सकती है।एक छड़ी या एक ही बैसाखी का प्रयोग करने से भी काफी लाभ मिल सकता है।जलन रोधी औषधियां के सेवन से भी जोड़ों की पीड़ा काफी हद तक कम हो जाती है।
अन्य तरीके
कोर्टीसोन इंजेक्शन को लगवाने से जोड़ों की जलन और पीड़ा कम हो जाती है। घुटनों के आर्थराइटिस के उपचार के लिए ग्लुकोसैमाइन सुरक्षित और असरदार औषधि मानी जाती है। घुटनों की आरथरोस्कोपी कुछ ख़ास लक्षणों में ही कारगर साबित होती है। घुटनों की ओस्टियोटोमी सीमित रूप से आर्थराइटिस से ग्रसित कम उम्र के रोगियों पर ही असर करता है। पूर्ण रूप से घुटनों के बदलाव की सर्जरी की प्रक्रिया से चबनी हड्डी को निकालकर धातु और प्लास्टिक की चबनी हड्डी के आकार की वस्तु डाली जाती है।
आंशिक रूप से घुटने के बदलाव की सर्जरी की प्रक्रिया से घुटने के एक ही भाग को बदला जाता है। यह सीमित रूप से घुटनों के आर्थराइटिस से ग्रसित रोगियों के लिए सर्जरी का एक अच्छा विकल्प है।
घुटने के दर्द से मुक्ति पाने के लिए फिजियोथेरेपी है सबसे ज्यादा असरकारक
घुटनों के दर्द से मुक्ति पाने के लिए फिजियोथेरेपी कारगर सबित होती है।
घुटनों में दर्द की समस्या आम हो गई है। इसके असहनीय दर्द से मुक्ति पाने के लिए लोग घुटनों की सर्जरी तक कराते हैं, लेकिन हाल में हुए एक अध्ययन से यह बात सामने आई है कि अनावश्यक सर्जरी की अपेक्षा यदि घुटनों की फिजियोथेरेपी कराई जाए तो यह इलाज में ज्यादा कारगर हो सकता है।
आजकल आथ्रेस्कोपिक सर्जरी आम बात हो गई है, लेकिन फिनलैंड में हुए इस अध्ययन की मानें तो हजारों लोग अनावश्यक रूप से ये सर्जरी कराते हैं। अध्ययन के मुताबिक, इस सर्जरी की संख्या कम होनी चाहिए। क्योंकि फिजियोथेरेपी इस रोग के निदान का एक अच्छा विकल्प मौजूद है।
हालांकि फिनलैंड के शोध में इस सर्जरी को कारगर माना गया है, लेकिन उनके मुताबिक सर्जरी कम उम्र के रोगियों पर की जाना चाहिए है। शोध के अनुसार 80 प्रतिशत मामलों में सर्जरी उतनी कारगर साबित नहीं होती।
अमेरिकन एकेडमी ऑफ आर्थोपेडिक के सर्जन, डेविड जेवसेवर ने इस संदर्भ में कहा है कि यह एक जाना माना अध्ययन है। यह अध्ययन कई शोध को विश्वसनीयता देता है जिसने यह दिखाया है कि मरीजों पर आथ्रेस्कोपी हमेशा बेहतर साबित नहीं रहती।
इस अध्ययन के लिए 5 अस्पतालों और 35 से 45 साल के 146 मरीजों को शामिल किया गया।
आर्थराइटिस के दर्द से छुटकारा पाने के लिए कुछ लाभकारी बातें
स्त्रियों में पुरुषों की अपेक्षा आर्थराइटिस होने का खतरा ज्यादा होता है। इससे बचने के लिए विशेषज्ञ हमें अपने आहार में ऐसे फलों और सब्जियों को शामिल करने की सलाह देते हैं जिनमें विटामिन, एंटीऑक्सीडेन्ट्स और पौष्टिक तत्व उचित मात्रा में मौजूद हों। कुछ खाद्य-पदार्थो का सेवन और कुछ बातों का ध्यान रखकर इस रोग पर काबू पाया जाया सकता है।
अदरक का उपयोग करें और दर्द से आराम पायें
सदियों से अदरक को दर्द निवारक के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। यह जोड़ों के दर्द से राहत दिलाने के लिए बहुत कारगर है। रोजाना दिन में दो बार अदरक का सेवन करने से आपको दर्द को दूर करने में मदद मिलती है।
ताजा फल का सेवन करने से होता है लाभ
ताजे फलों और सब्जियों के रस जोड़ों के दर्द में अद्भुत उपचार हैं। ऐसा माना जाता है कि लहसुन, मौसमी, संतरा, गाजर और चुकंदर के रस का पर्याप्त सेवन इस रोग से निजात दिलाने में सहायक है।
फूल गोभी का रस है फायदेमंद
फूल गोभी में मौजूद तत्व जोड़ों के दर्द को कम करने में बहुत मदद करते हैं। माना जाता है कि रोजाना इसका रस पीने से जोड़ों के दर्द को कम करने में मदद मिलती है। यदि आपको थायराइड की समस्या हो, तो एक बार डॉक्टर से सलाह करके ही फूल गोभी का सेवन करें।
नींबू के रस से मालिश से मिलाता है आराम
नींबू का रस बहुत अच्छा दर्द निवारक माना जाता है। जोड़ों पर नींबू के रस की मालिश करने से दर्द में राहत मिलती है। आप चाहें तो रोजाना नींबू पानी का सेवन भी कर सकते हैं। इससे जोड़ों की सूजन कम होती है और दर्द कम होता है।
गर्म पानी से मिलती है राहत
जोड़ों में दर्द के समय या बाद में गर्म पानी के टब में लेटने से काफी राहत मिलती है। इसके साथ ही यदि आप चाहें तो गर्म पानी के शॉवर के नीचे बैठें। आपको निश्चित ही राहत मिलेगी। और दर्द कम हो जाएगा।
बाम के ज्यादा प्रयोग से हो सकता है नुकसान
दर्द घटाने के बाम, क्रीम आदि बार-बार इस्तेमाल न करें। इनके द्वारा पैदा हुई गर्मी से राहत तो मिलती है, पर धीरे-धीरे ये नुकसान पहुंचाते हैं। इसलिए लंबे समय तक बाम का इस्तेमाल आपको नुकसान पहुंचा सकता है। कभी भी दर्द निवारक बाम लगाकर उस पर सेंक न करें। इससे जलन बहुत बढ़ सकती है।
जोड़ों के दर्द के लिए चमत्कारिक दवा, तेल या मालिश वगैरह के दावे बहुत किए जाते हैं। इन्हें आंख मूंदकर इस्तेमाल करने से बचें। अकसर ऐसे दावे सच नहीं निकलते और बाद में आपको पछताना पड़ सकता है।
घुटनों के दर्द को दूर करने के 4 जरूरी एक्सरसाइज
जोड़ों में दर्द का एक आम समस्या है, जिसका प्रमुख कारण अकसर आर्थराइटिस, जिसे गठिया भी कहा जाता है, होता है। विशेषकर 60 की उम्र के बाद यह ज्यादा परेशान करता है। इसमें रोगी के हड्डियों में सूजन, अकड़न और जोड़ों में दर्द होता है। ऐसा जोड़ों में यूरिक एसिड जमने की वजह से होता है। यूरिक एसिड के जमने से मरीज के जोड़ों में गाठें भी बन जाती हैं। अधिकतर मामलों में यह समस्या अधिक उम्र के लोगों में ही होता है। इसके अलावा सर्दियों में लोगों की जीवनशैली बदलती है। गर्मियों के मौसम के मुकाबले इस मौसम में खान-पान बढ़ जाता है, और सुबह की एक्सरसाइज या वाकिंग नहीं हो पाती, सुबह लेट उठना, धूप न होना आदि कारणों से आर्थराइटिस की समस्या बढ़ने लगती है। लेकिन घुटनों के दर्द की इस समस्या से कुछ एक्सरासइज आपको आराम दिला सकते हैं।
इसके अलावा आमतौर पर घुटने का दर्द या तो किसी दुर्घटना में लगी चोट या फिर घुटने पर बहुत ज्यादा दबाव पड़ने से होता है। अस्थिरज्जु के फटने से भी घुटने का दर्द हो सकता है। कई बार हमारी रोजमर्रा की गतिविधियां जैसे वॉकिंग, रनिंग, जंपिंग या सीढ़ियां चढ़ने से घुटने पर बहुत ज्यादा दबाव पड़ सकता है। और घुटने की अस्थिरज्जु में टूट-फूट हो जाती है, जिससे जोड़ों का दर्द हो सकता है। इसलिये घुटनों के लिये कुछ नियमित व्यायाम जरूरी होता है। ताकी वे मजबूत रहें और इस प्रकार की समस्याओं से बचे रहें।
१ - स्ट्रेचिंग करें
घुटनों के दर्द से आराम पाने के लिए मसल स्ट्रेचिंग एक कारगर एक्सरसाइज है। ऐसी कई स्ट्रेचिंग एक्सरसाइज हैं जिन्हें करना घुटने के लिए काफी लाभदायक होता हैं। ऐसी ही एक एक्सरसाइज हैम्स्ट्रिंग स्ट्रेचिंग भी हैस जिससे घुटनों के मसल ढीले होते हैं। इस एक्सरसाइज को करने के लिए आप एक पैर आगे करें और दूसरे पैर के घुटने को इतना मोड़ें कि दबाव महसूस होने लगें। आप ऐसे ही कुछ और स्ट्रेचिंग एक्सरसाइज भी कर सकते हैं।
२ - योगासन करें
अगर आपका घुटना किसी वजह से चोटिल हो गया है तो आप योगा कर सकते हैं। योग करने से मसल्स रीलैक्स होते हैं और घुटने पर से दबाव व तनाव भी कम होता है। ऐसे कई योगआसन हैं जो खासतौर पर घुटने को आराम पहुंचाने के लिए होते है। अन्य एक्सरसाइज की तुलना में योगा का असर अधिक समय तक रहता है। यदि आप नियमित रूप से सूर्यनमस्कार करें तो भी घुटने का दर्द काफी कम होता है।
३ - स्टेप अप
स्टेपिंग या स्टेप अप्स एक प्रकार की कार्डियो एक्सरसाइज होती है। यह एक्सरसाइज दिल की धड़कन को बढ़ाती है, शरीर में गर्मी पैदा करती है और पूरे शरीर को ऊर्जावान भी बनाती है। स्टेप अप करते समय अपने घुटने को न मोड़ें, बल्कि उसे पूरी तरह सीधा रखें। साथ ही एक समान गति से एक मिनट तक लगातार स्टेप अप करने से घुटने को काफी फायदा होता है। यदि आप किसी प्रकार की घुटने की चोट से जूझ रहें हैं तो इस एक्सरसाइज को कर सकते हैं।
४ - मैट एक्सरसाइज करें
कुछ मैट एक्सरसाइज जैसे लेग लिफ्ट व नी लिफ्ट आदि में घुटने के मसल्स स्ट्रेच होते हैं, जिससे घुटने के दर्द को कम करने में सहायता होती है। मैट एक्सरसाइज को घर पर भी किया जा सकता है। ध्यान रहेकि इसे करतेसमय अपने पैर को ऊपर की ओर उठाते वक्त घुटने को न मोड़ें और कुछ देर पैर को उठा हुआ रहने दें। घुटने की चोट के लिए यह एक्सरसाइज काफी फादेमंद होती है।
लेकिन किसी भी प्रकार की एक्सरसाइज को शुरू करने से पहले एक बार डॉक्टर से जांच घुटनों की जांच अवश्य करा लें, और इस विषय में सलाह लें कि आप ये एक्सरसाइज शुरू कर सकते हैं या नहीं।
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इस जानकारी की सटीकता , समयबद्धता और वास्तविकता सुनिश्चित करने का हर संभव प्रयास किया गया है । इसकी नैतिक जिम्मेदारी लेखक की नहीं है। इस लेख में उपलब्ध सभी साम्रगी केवल पाठकों की जानकारी और ज्ञानवर्धन के लिए दी गई है। हमारा आपसे विनम्र निवेदन है कि किसी भी उपाय को आजमाने से पहले अपने चिकिस्तक से अवश्य संपर्क करें। हमारा उद्येश्य आपको रोचक और ज्ञानवर्धक जानकारी मुहैया कराना मात्र है। आपका चिकिस्तक आपकी सेहत के बारे में बेहतर जानता है और उसकी सलाह का कोई विकल्प नहीं है।
Posted by D.R. Singh on Saturday 9 April 2016
बवासीर
बवासीर
परिचय
होमोरोइड या अर्श UK /ˈhɛmərɔɪdz/, गुदा-नाल में वाहिकाओं की वे संरचनाएं हैं जो मल नियंत्रण में सहायता करती हैं जब वे सूज जाते हैं या बड़े हो जाते हैं तो वे रोगजनक या बवासीर हो जाते हैं। अपनी शारीरिक अवस्था में वे धमनीय-शिरापरक वाहिका और संयोजी ऊतक द्वारा बने कुशन के रूप में काम करते हैं।
बवासीर दो प्रकार की होती है - खूनी बवासीर और बादी वाली बवासीर। खूनी बवासीर में मस्से खूनी सुर्ख होते है और उनसे खून गिरता है जबकि बादी वाली बवासीर में मस्से काले रंग के होते है और मस्सों में खाज पीडा और सूजन होती है। अतिसार, संग्रहणी और बवासीर यह एक दूसरे को पैदा करने वाले होते है।
मनुष्य की गुदा में तीन आवृत या बलियां होती हैं जिन्हें प्रवाहिणी, विर्सजनी व संवरणी कहते हैं जिनमें ही अर्श या बवासीर के मस्से होते हैं आम भाषा में बवासीर को दो नाम दिये गए है बादी बवासीर और खूनी बवासीर। बादी बवासीर में गुदा में सुजन, दर्द व मस्सों का फूलना आदि लक्षण होते हैं कभी-कभी मल की रगड़ खाने से एकाध बूंद खून की भी आ जाती है। लेकिन खूनी बवासीर में बाहर कुछ भी दिखाई नहीं देता लेकिन पाखाना जाते समय बहुत वेदना होती है और खून भी बहुत गिरता है जिसके कारण रकाल्पता होकर रोगी कमजोरी महसूस करता है। रोगजनक अर्श के लक्षण उपस्थित प्रकार पर निर्भर करते हैं। आंतरिक अर्श में आम तौर पर दर्द-रहित गुदा रक्तस्राव होता है जबकि वाह्य अर्श कुछ लक्षण पैदा कर सकता है या यदि थ्रोम्बोस्ड (रक्त का थक्का बनना) हो तो गुदा क्षेत्र में काफी दर्द व सूजन होता है। बहुत से लोग गुदा-मलाशय क्षेत्र के आसपास होने वाले किसी लक्षण को गलत रूप से “बवासीर” कह देते हैं जबकि लक्षणों के गंभीर कारणों को खारिज किया जाना चाहिए।हालांकि बवासीर के सटीक कारण अज्ञात हैं, फिर भी कई सारे ऐसे कारक हैं जो अंतर-उदर दबाव को बढ़ावा देते हैं- विशेष रूप से कब्ज़ और जिनको इसके विकास में एक भूमिका निभाते पाया जाता है।
हल्के से मध्यम रोग के लिए आरंभिक उपचार में फाइबर (रेशेदार) आहार, जलयोजन बनाए रखने के लिए मौखिक रूप से लिए जाने वाले तरल पदार्थ की बढ़ी मात्रा, दर्द से आराम के लिए NSAID (गैर-एस्टरॉएड सूजन रोधी दवा) और आराम, शामिल हैं। यदि लक्षण गंभीर हों और परम्परागत उपायों से ठीक न होते हों तो अनेक हल्की प्रक्रियाएं अपनायी जा सकती हैं। शल्यक्रिया का उपाय उन लोगों के लिए आरक्षित है जिनमें इन उपायों का पालन करने से आराम न मिलता हो। लगभग आधे लोगों को, उनके जीवन काल में किसी न किसी समय बवासीर की समस्या होती है। परिणाम आमतौर पर अच्छे रहते हैं।
चिह्न व लक्षण
वाह्य तथा आंतरिक बवासीर भिन्न-भिन्न रूप में उपस्थित हो सकता है; हालांकि बहुत से लोगों में इन दोनो का संयोजन भी हो सकता है। रक्ताल्पता पैदा करने के लिए अत्यधिक रक्त-स्राव बेहद कम होती है,और जीवन के संकट पैदा करने वाले रक्तस्राव के मामले तो और भी कम हैं। इस समस्या का सामना करने वाले बहुत से लोगों को लज्जा आती है और मामला उन्नत होने पर ही वे चिकित्सीय लेने जाते हैं।
सावधानियाँ एवं उपचार
१ - बवासीर के रोगी को बादी और तले हुये पदार्थ नही खाने चाहिये, जिनसे पेट में कब्ज की संभावना हो
२ - हरी सब्जियों का ज्यादा प्रयोग करना चाहिये,
३ - बवासीर से बचने का सबसे सरल उपाय यह है कि शौच करने उपरान्त जब मलद्वार साफ़ करें तो गुदा द्वार को उंगली डालकर अच्छी तरह से साफ़ करें, इससे कभी बवासीर नही होता है। इसके लिये आवश्यक है कि मलद्वार में डालने वाली उंगली का नाखून कतई बडा नही हो, अन्यथा भीतरी मुलायम खाल के जख्मी होने का खतरा होता है। प्रारंभ में यह उपाय अटपटा लगता है पर शीघ्र ही इसके अभ्यस्त हो जाने पर तरोताजा महसूस भी होने लगता है।
वाह्य
यदि थ्रोम्बोस्ड (रक्त का थक्का बनना) न बने तो वाह्य बवासीर कुछ समस्याएं पैदा कर सकता है। हालांकि, जब रक्त का थक्का बनता है तो बवासीर काफी दर्द भरा हो सकता है।फिर भी यह दर्द आम तौर पर 2 – 3 दिनों में कम हो जाता है। हालांकि सूजन जाने में कुछ सप्ताह लग सकते हैं।ठीक हो जाने के बाद त्वचा टैग (त्वचा का एक टुकड़ा) बचा रह सकता है यदि बवासीर बड़े हों और स्वच्छता से जुड़ी समस्याएं पैदा करें तो वे आसपास की त्वचा में परेशानी पैदा कर सकते हैं और गुदा के आसपास खुजली पैदा कर सकते हैं।
आंतरिक
आंतरिक वबासीर आमतौर पर दर्द रहित, चमकदार लाल होता है तथा मल त्याग के दौरान गुदा से रक्त स्राव हो सकता है। आम तौर पर मल रक्त से लिपटा होता है यह एक स्थिति होती है जिसे हेमाटोचेज़िया कहते है इसमें रक्त टॉएलेट पेपर पर दिखता है या शौच स्थान से बह जाता है। मल का अपना रंग सामान्य होता है। अन्य लक्षणों में श्लेष्म स्राव, यदि मांस का टुकड़ा गुदा से भ्रंश हो तो वह, खिचाव तथा असंयमित मल शामिल हैं। आंतरिक बवासीर आम तौर पर केवल तब दर्द रहित होते हैं जब वे थ्रोम्बोस्ड या नैक्रोटिक हो जाते हैं।
कारण-
लक्षणात्मक बवासीर का सटीक कारण अज्ञात है।इसके होने में भूमिका निभाने वाले कारकों में अनियमित मल त्याग आदतें (कब्ज़ या डायरिया), व्यायाम की कमी, पोषक कारक (कम-रेशे वाले आहार), अंतर-उदरीय दाब में वृद्धि (लंबे समय तक तनाव, जलोदर, अंतर-उदरीय मांस या गर्भावस्था), आनुवांशिकी, अर्श शिराओं के भीतर वॉल्व की अनुपस्थिति तथा बढ़ती उम्र शामिल हैं। अन्य कारक जो जोखिम बढ़ाते हैं उनमें मोटापा, देर तक बैठना,या पुरानी खांसी और श्रोणि तल दुष्क्रिया शामिल हैं। हालांकि इनका संबंध काफी कमजोर है।
गर्भावस्था के दौरान भ्रूण का उदर पर दाब तथा हार्मोन संबंधी बदलाव अर्श वाहिकाओं में फैलाव पैदा करते हैं। प्रसव के कारण भी अंतर-उदरीय दाब बढ़ता है। गर्भवती महिलाओं को शल्यक्रिया उपचार की बेहद कम आवश्यकता पड़ती है क्योंकि प्रसव के पाद लक्षण आमतौर पर समाप्त हो जाते हैं।
पैथोफिज़ियोलॉजी (रोग के कारण पैदा हुए क्रियात्मक परिवर्तन)
अर्श कुशन सामान्य मानवीय संरचना का हिस्सा हैं और वे रोग जनक केवल तब बनते हैं जब उनमें असमान्य परिवर्तन होते हैं। सामान्य तौर पर गुहा मार्ग में तीन मुख्य प्रकार के कुशन उपस्थित होते हैं। ये बाएं पार्श्व, दाएँ अग्रस्थ और दाएँ कूल्हे की स्थितियों पर स्थित होते हैं। इनमें न तो धमनियां होती है और न ही नसें बल्कि इनमें रक्त वाहिकाएं होती हैं जिनको साइनोसॉएड्स कहा जाता है तथा इनमें संयोजी ऊतक तथा चिकनी मांसपेशियां होती हैं। साइनोसॉएड की दीवारों में रक्त वाहिकाओं के समान मांसपेशीय ऊतक नहीं होते हैं। रक्त वाहिकाओं के इस समूह को अर्श स्नायुजालकहा जाता है।
अर्श कुशन मल संयम के लिए महत्वपूर्ण होते हैं। ये आराम की स्थिति में गुदा बंदी दाब का 15–20% भाग का योगदान करते हैं और मल को मार्ग देते समय गुदा संवरणी मांसपेशियों की रक्षा करते हैं। जब कोई व्यक्ति नीचे झुकता है तो अंतर-उदर दाब बढ़ता है और अर्श कुशन, अपने आकार को संयोजित करके गुदा को बंद रखने में सहयोग करता है। यह विश्वास किया जाता है कि बवासीर लक्षण तब पैदा होते हैं जब ये संवहनी संरचनाएं नीचे की ओर सरकती हैं या जब शिरापरक दबाव बहुत अधिक बढ़ जाता है। बढ़ा हुआ गुदा संवरणी दाब भी बवासीर लक्षणों में शामिल हो सकता है। बवासीर दो तरह के होते हैं:बढ़े हुए अर्श स्नायुजाल के कारण आंतरिक और घटे हुए अर्श स्नायुजाल के कारण वाह्य। एक दांतेदार पंक्ति दोनो क्षेत्रों को विभक्त करती है।
निदान
बवासीर का निदान आम तौर पर शारीरिक परीक्षण से किया जाता है। गुदा तथा इसके आसपास के क्षेत्र को देख कर वाह्य या भ्रंश बवासीर का निदान किया जा सकता है।किसी गुदा परीक्षण को करके संभव गुदीय ट्यूमर, पॉलिप, बढ़े हुए प्रोस्टेट या फोड़े की पहचान की जाती है। दर्द के कारण, यह परीक्षण शांतिकर औषधि के बिना संभव नहीं है, हालांकि अधिकांश आंतरिक बवासीर में दर्द नहीं होता है। आंतरिक बवासीर की देख कर पुष्टि करने के लिए एनोस्कोपी की जरूरत पड़ सकती है जो कि एक खोखली ट्यूब वाली युक्ति होती है जिसके एक सिरे पर प्रकाश का स्रोत लगा होता है। बवासीर के दो प्रकार होते हैं: वाह्य तथा आंतरिक। इनको दांतेदार पंक्तिके सापेक्ष इनकी स्थिति से निर्धारित किया जाता है। कुछ लोगों में एक साथ दोनो के लक्षण होते हैं।यदि दर्द उपस्थित हो तो यह स्थिति एक गुदा फिशर या वाह्य बवासीर की हो सकती है न कि आंतरिक बवासीर की।
चिकित्सा
सबसे पहले रोग में मुख्य कारण कब्ज को दूर करना चाहिए जिसके लिए ठण्डा कटि स्नाना व एनिमा लेना चाहिए पेट पर ठण्डी मिट्टी पट्टी रखनी चाहिए लेकिन यदि सूजन ज्यादा हो तो एनिमा लेने की बजाय त्रिफला आदि चूर्ण का सेवन करना चाहिए गुदा पर ठण्डी मिट्टी की पट्टी रखनी चाहिए। और सूजन दूर होने पर ही तेज आदि लगाकर एनिमा लेना चाहिए। उपवास करना चाहिए और यदि उपवास ना कर सके तो फलाहार या रसा हार पर रखना चाहिए और साथ-साथ आसन, प्राणायाम, कपाल भाति आदि करने से इस भयंकर रोग से छुटकारा पाया जा सकता है।
बवासीर के आयुर्वेदिक उपचार • डेढ़-दो कागज़ी नींबू अनिमा के साधन से गुदा में लें। दस-पन्द्रह संकोचन करके थोड़ी देर लेते रहें, बाद में शौच जायें। यह प्रयोग 4- 5 दिन में एक बार करें। 3 बार के प्रयोग से ही बवासीर में लाभ होता है। साथ में हरड या बाल हरड का नित्य सेवन करने और अर्श (बवासीर) पर अरंडी का तेल लगाने से लाभ मिलता है। • नीम का तेल मस्सों पर लगाने से और 4- 5 बूँद रोज़ पीने से लाभ होता है। • करीब दो लीटर छाछ (मट्ठा) लेकर उसमे 50 ग्राम पिसा हुआ जीरा और थोडा नमक मिला दें। जब भी प्यास लगे तब पानी की जगह पर यह छास पी लें। पूरे दिन पानी की जगह यह छाछ (मट्ठा) ही पियें। चार दिन तक यह प्रयोग करें, मस्से ठीक हो जायेंगे। • अगर आप कड़े या अनियमित रूप से मल का त्याग कर रहे हैं, तो आपको इसबगोल भूसी का प्रयोग करने से लाभ मिलेगा। आप लेक्टूलोज़ जैसी सौम्य रेचक औषधि का भी प्रयोग कर सकते हैं। • आराम पहुंचानेवाली क्रीम, मरहम, वगैरह का प्रयोग आपको पीड़ा और खुजली से आराम दिला सकते हैं। • ऐसे भी कुछ उपचार हैं जिनमे शल्य चिकित्सा की और अस्पताल में भी रहने की ज़रुरत नहीं पड़ती। बवासीर के उपचार के लिये अन्य आयुर्वेदिक औषधियां हैं: अर्शकुमार रस, तीक्ष्णमुख रस, अष्टांग रस, नित्योदित रस, रस गुटिका, बोलबद्ध रस, पंचानन वटी, बाहुशाल गुड़, बवासीर मलहम वगैरह। बवासीर की रोकथाम: • अपनी आँत की गतिविधियों को सौम्य रखने के लिये, फल, सब्ज़ियाँ, सीरियल, ब्राउन राईस, ब्राउन ब्रेड जैसे रेशेयुक्त आहार का सेवन करें। • तरल पदार्थों का अधिक से अधिक सेवन करें।
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Posted by D.R. Singh on Saturday 9 April 2016
