जानिये शरीर में क्यों हो जाती है विटामिन डी की कमी
जानिये शरीर में क्यों हो जाती है विटामिन डी की कमी
विटामिन डी से ही हड्डियां मजबूत होती हैं और अगर इसकी कमी हो जाये तो हमारा मूल ढांचा प्रभावित हो जाता है, शरीर में विटामिन डी की कमी के पीछे के कारणों के बारे में जानने के लिए यह लेख पढ़ें।
विटामिन डी
वसा-घुलनशील प्रो-हार्मोन का एक समूह होता है। इसके दो प्रमुख रूप हैं:विटामिन डी (या अर्गोकेलसीफेरोल) एवं विटामिन डी३ (या कोलेकेलसीफेरोल) सूर्य के प्रकाश, खाद्य एवं अन्य पूरकों से प्राप्त विटामिन डी निष्क्रीय होता है। इसे शरीर में सक्रिय होने के लिये कम से कम दो हाईड्रॉक्सिलेशन अभिक्रियाएं वांछित होती हैं। शरीर में मिलने वाला कैल्सीट्राईऑल (१,२५-डाईहाईड्रॉक्सीकॉलेकैल्सिफेरॉल) विटामिन डी का सक्रिय रूप होता है। त्वचा जब धूप के संपर्क में आती है तो शरीर में विटामिन डी निर्माण की प्रक्रिया आरंभ होती है। यह मछलियों में भी पाया जाता है। विटामिन डी की मदद से कैल्शियम को शरीर में बनाए रखने में मदद मिलती है जो हड्डियों की मजबूती के लिए अत्यावश्यक होता है। इसके अभाव में हड्डी कमजोर होती हैं व टूट भी सकती हैं। छोटे बच्चों में यह स्थिति रिकेट्स कहलाती है और व्यस्कों में हड्डी के मुलायम होने को ओस्टीयोमलेशिया कहते हैं। इसके अलावा, हड्डी के पतला और कमजोर होने को ओस्टीयोपोरोसिस कहते हैं। इसके अलावा विटामिन डी कैंसर, क्षय रोग जैसे रोगों से भी बचाव करता है।
डेनमार्क के शोधकर्ताओं के अनुसार विटामिन डी शरीर की टी-कोशिकाओं की क्रियाविधि में वृद्धि करता है, जो किसी भी बाहरी संक्रमण से शरीर की रक्षा करती हैं। इसकी मानव प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत करने में मुख्य भूमिका होती है और इसकी पर्याप्त मात्रा के बिना प्रतिरक्षा प्रणालीकी टी-कोशिकाएं बाहरी संक्रमण पर प्रतिक्रिया देने में असमर्थ रहती हैं। टी-कोशिकाएं सक्रिय होने के लिए विटामिन डी पर निर्भर रहती हैं। जब भी किसी टी-कोशिका का किसी बाहरी संक्रमण से सामना होता है, यह विटामिन डी की उपलब्धता के लिए एक संकेत भेजती है। इसलिये टी-कोशिकाओं को सक्रिय होने के लिए भी विटामिन डी आवश्यक होता है। यदि इन कोशिकाओं को रक्त में पर्याप्त विटामिन डी नहीं मिलता, तो वे चलना भी शुरू नहीं करतीं हैं।
अधिकता: विटामिन डी की अधिकता से शरीर के विभिन्न अंगों, जैसे गुर्दों में, हृदय में, रक्त रक्त वाहिकाओं में और अन्य स्थानों पर, एक प्रकार की पथरी उत्पन्न हो सकती है। ये विटामिन कैल्शियम का बना होता है, अतः इसके द्वारा पथरी भी बन सकती है। इससे रक्तचाप बढ सकता है, रक्त मेंकोलेस्टेरॉल बढ़ सकता है और हृदय पर प्रभाव पड़ सकता है। इसके साथ ही चक्कर आना, कमजोरी लगना और सिरदर्द, आदि भी हो सकता है। पेट खराब होने से दस्त भी हो सकता है।
विटामिन डी के स्रोत
इसके मुख्य स्रोतों में अंडे का पीला भाग, मछली के तेल, विटामिन डी युक्त दूध और मक्खन होते हैं। इनके अलावा मुख्य स्रोत धूप सेंकना होता है।दुग्धशाला उत्पाद। बदन में धूप सेकने से कुछ एक विटामिन त्वचा में भी पैदा हो सकते है।
विटामिन डी की भूमिका
रक्त में कैल्सियम का स्तर बनाए रखना हडिडयों के संवर्द्धन के लिए आवश्यक है। 5-10 मि. ग्रा कैल्सियम की आवश्यकता शरीर की हड्डियों को मजबूत बनाये रखने के प्रतिदिन आवश्यक होता है।
बार-बार बीमार होने से बचाता है विटामिन डी
शरीर के कमजोर प्रतिरक्षा तंत्र के कारण अगर आप बार-बार बीमार पड़ते हैं, तो आपको जरूरत है, ढेर सारे विटामिन डी के सेवन की। वैज्ञानिकों ने दावा किया है कि सूर्य की रोशनी में बनने वाला विटामिन डी प्रकृति का सर्वश्रेष्ठ प्रतिजैविक है, जो शरीर के प्रतिरक्षा तंत्र को मजबूत करता है।
डेनमार्क के शोधकर्ताओं ने अपने शोध में दावा किया है कि विटामिन डी शरीर की टी कोशिकाओं की क्रियाविधि को बढ़ाता है, जो किसी भी बाहरी संक्रमण से शरीर को बचाती हैं। शोधकर्ताओं के अनुसार विटामिन डी मानव प्रतिरक्षा तंत्र को मजबूत करने में अहम है और इसकी पर्याप्त मात्रा के बिना प्रतिरक्षा तंत्र की टी कोशिकाएं बाहरी संक्रमण पर प्रतिक्रिया देने में असमर्थ रहती हैं।
शोधकर्ताओं ने बताया कि टी कोशिकाएं सक्रिय होने के लिए विटामिन डी पर निर्भर रहती हैं। द डेली टेलीग्राफ ने कोपनहेगन विश्वविद्यालय के मुख्य शोधकर्ता प्रो कार्स्टन गेस्लर के हवाले से कहा जब भी किसी टी कोशिका का किसी बाहरी संक्रमण से सामना होता है, यह विटामिन डी की तलाश के लिए एक सिगनल भेजती है। उन्होंने बताया इसका मतलब है कि टी कोशिकाओं को सक्रिय होने के लिए भी विटामिन डी की जरूरत है। अगर इन कोशिकाओं को खून में पर्याप्त विटामिन डी नहीं मिलता, तो वह चलना भी शुरू नहीं करतीं।
विटामिन-डी की कमी के लक्षण
विटामिन-डी शरीर के विकास, हड्डियों के विकास और स्वास्थ्य के लिए बहुत जरूरी है। धूप के संपर्क में आने पर त्वचा इसका निर्माण करने लगती है। हालांकि यह विटामिन खाने की कुछ चीज़ों से भी प्राप्त होता है,लेकिन इनमें यह बहुत ही कम मात्रा में होता है। केवल इनसे विटामिन-डी की जरूरत पूरी नहीं हो जाती है। आइए जानते हैं विटामिन-डी की कमी के लक्षण क्या हैं?
वयस्कों में विटामिन-डी की कमी के लक्षण
- दर्द या तेज दर्द
- कमजोरी एवं ओस्टियोमेलेशिया
- हड्डियों का दर्द (आमतौर पर कूल्हों, पसलियों और पैरों आदि की हड्डियों में)
खून में विटामिन-डी की कमी होने पर ये आशंकाएं प्रबल होती हैं।
- कार्डियोवेस्क्युलर रोगों से मृत्यु
- याददाश्त कमजोर होना
- बच्चों के अस्थमा से गंभीर रूप से प्रभावित होना एवं कैंसर।
विटामिन-डी मधुमेह, उच्च रक्तचाप, ग्लुकोल इनटॉलरेंस और मल्टिपल स्क्लेरोसिस आदि बीमारियों से बचाव और इलाज में महत्वपूर्ण हो सकता है।
बच्चों में विटामिन-डी की कमी के लक्षण
- शिशुओं में इसकी कमी होने पर मांसपेशियों में मरोड़े, सांस लेने में परेशानी और दौरे आने की परेशानी हो सकती है। उनके शरीर में कैल्शियम की भी कमी हो जाती है। सांस की तकलीफ के कारण बच्चे की पसलियां (रिब केज) नर्म रह जाता है और आस-पास की मांसपेशियां भी कमजोर रह जाती हैं।
- विटामिन-डी की गंभीर कमी होने से उनके पैरों की हड्डियां और खोपड़ी कमजोर रह जाती हैं। छूने पर यह हड्डियां नर्म महसूस होती हैं। हड्डियों से शरीर का बनुयादी ढांचा तैयार होता है, लेकिन रिकेट्स जैसी बीमारी में हड्डियां लचीली हो जाती हैं। पैरों की हड्डियां कमजोर हो कर मुड़ने लगें तो यह स्थिति रिकेट्स कहलाती है।
- समय पर दांत न आना विटामिन डी की कमी का ही लक्षण है।
बच्चों में विटामिन-डी विटामिन-डी की कमी के कई कारण हो सकते हैं
- लंबे समय तक शरीर को यह पर्याप्त मात्रा में न मिल पाना। यह समस्या उन लोगों में अधिक होती है, जो पूर्णतः शाकाहारी आहार ही लेते हैं। प्राकृतिक रूप से विटामिन-डी केवल पशुओं से मिलने वाले आहार से ही प्राप्त होता है, इसलिए केवल शाकाहारी भोजन लेने वालों में विटामिन-डी की कमी की आशंका रहती है। शरीर पर धूप न लगना।
- त्वचा का रंग बहुत गहरा होना। त्वचा का गहरा रंग मिलेनिन नामक पिगमेंट के कारण होता है। मिलेनन बहुत अधिक होने के कारण धूप लगने पर त्वचा में विटामिन-डी का निर्माण ठीक से नहीं हो पाता।
- किडनी विटामिन-डी को उसके सक्रिय रूप में परिवर्तित न कर पाएं तो शरीर में इसकी कमी होने लगती है। उम्र बढ़ने के साथ किडनी की कार्यक्षमता प्रभावित होने लगती है, जिससे यह विटामिन-डी को परिवर्तित नहीं कर पाती। पाचन तंत्र इसे अवशोषित नहीं कर पाए तो भी इसकी कमी हो जाती है। कुछ बीमारियों के कारण पाचन तंत्र की विटामिन-डी अवशोषित करने की क्षमता प्रभावित होती है।
मोटापा :
रक्त में मौजूद विटामिन-डी को फैट की कोशिकाएं अवशोषित कर लेती हैं, जिससे शरीर को इसका फायदा नहीं मिल पाता है।
- रक्त में विटामिन-डी का स्तर जानने के लिए जांच की जा सकती है। अपने चिकित्सक से इसके बारे में जान सकते हैं।
बच्चों को विटामिन-डी की कमी न हो, इसके लिए ध्यान रखें
- गर्भावस्था में महिला के शरीर में विटामिन-डी की कमी होने पर शिशु में भी इसकी कमी की आशंका होती है। जिन महिलाओं का रंग गहरा होता है, उन्हें इसकी आपूर्ति का विशेष ध्यान रखना चाहिए।
- समय से पहले जन्में शिशुओं में इसकी कमी हो सकती है। केवल स्तनपान करने वाले शिशुओं में विटामिन-डी की कमी हो सकती है। जिन बच्चों को फॉर्मूला मिल्क दिया जाता है, उनमें यह आशंका और भी बढ़ जाती है।
- मोटापा : मोटापा बढ़ने के साथ ही शरीर में विटामिन-डी का स्तर घटता जाता है। ऐसे लोगों को विटामिन-डी की आपूर्ति के साथ ही मोटापा घटाने की ओर भी ध्यान देना चाहिए, क्योंकि रक्त में मौजूद विटामिन-डी को फैट कोशिकाएं अवशोषित कर लेती हैं और समस्या जस की तस बनी रह सकती है या फिर बदतर भी हो सकती है।
विटामिन डी की कमी के कारण
विटामिन डी हमारे संपूर्ण स्वास्थ्य के लिए जरूरी है। यह शरीर में कैल्शियम के स्तर को नियंत्रित करने का काम करता है, जो तंत्रिका तंत्र की कार्य प्रणाली और हड्डियों की मजबूती के लिए जरूरी है। यह शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाता है। विटामिन डी के लक्षण एकदम उभर कर सामने नहीं आते, इसी वजह से लोगों को समय पर विटामिन डी की कमी से होने वाले रोगों का पता ही नहीं चल पाता। इसलिए विटामिन डी की नियमित जांच और विटामिन डी युक्त भोजन लेना जरूरी है।
सूर्य की किरणे
विटामिन-डी का मुख्य स्रोत सूर्य की किरणे हैं, जो शरीर में जाने के बाद रिएक्शन कर विटामिन-डी बनाती हैं. जो लोग धूप में नहीं रहते या उनको किसी भी कारण धूप नहीं मिलती तो उनके शरीर में इसकी कमी हो जाती है। इसके अलावा सही खानपान का अभाव भी इसकी कमी का कारण है। खून में विटामिन-डी की मात्रा 20 मोनोग्राम प्रति मिलीलीटर से अधिक होनी चाहिए, इससे कम होना नुकसानदायक है।
मोटापा
विटामिन डी हमारे संपूर्ण स्वास्थ्य के लिए जरूरी है। यह शरीर में कैल्शियम के स्तर को नियंत्रित करने का काम करता है, जो तंत्रिका तंत्र की कार्य प्रणाली और हड्डियों की मजबूती के लिए जरूरी है। यह शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाता है। विटामिन डी के लक्षण एकदम उभर कर सामने नहीं आते, इसी वजह से लोगों को समय पर विटामिन डी की कमी से होने वाले रोगों का पता ही नहीं चल पाता। इसलिए विटामिन डी की नियमित जांच और विटामिन डी युक्त भोजन लेना जरूरी है।
त्वचा का रंग गहरा होना
त्वचा का गहरा रंग मिलेनिन नामक पिगमेंट के कारण होता है। मिलेनन बहुत अधिक होने के कारण धूप लगने पर त्वचा में विटामिन-डी का निर्माण ठीक से नहीं हो पाता। कुछ शोधो का मानना है कि बढती उम्र मे गहरे रंग की त्वचा वालों के विटामिन डी की कमी की समस्या का सामना करना पड़ सकता है।
किडनी परिवर्तित न कर पाएं
किडनी विटामिन-डी को उसके सक्रिय रूप में परिवर्तित न कर पाएं तो शरीर में इसकी कमी होने लगती है। उम्र बढ़ने के साथ किडनी की कार्यक्षमता प्रभावित होने लगती है, जिससे यह विटामिन-डी को परिवर्तित नहीं कर पाती। पाचन तंत्र इसे अवशोषित नहीं कर पाए तो भी इसकी कमी हो जाती है। कुछ बीमारियों के कारण पाचन तंत्र की विटामिन-डी अवशोषित करने की क्षमता प्रभावित होती है।
शाकाहारी होना
प्राकृतिक रूप से विटामिन-डी केवल पशुओं से मिलने वाले आहार से ही प्राप्त होता है, इसलिए केवल शाकाहारी भोजन लेने वालों में विटामिन-डी की कमी की आशंका रहती है।यह समस्या उन लोगों में अधिक होती है, जो पूर्णतः शाकाहारी आहार ही लेते हैं।
शारीरिक क्रियाशीलता
आजकल की डेस्क जॉब ने हमारी शारीरिक क्रियाशीलता को कम कर दिया जिससे हमारी पाचनशक्ति प्रभावित हो गई है। इससे आहारों के अलावा तेज चलने, दौडऩे, सीढ़ी चढ़ने और डांस करने से हड्डियों की मजबूती बनी रहती है और वे कमजोर नहीं होतीं। साथ ही मांसपेशियों की मजबूती भी बनी रहती है।
विटामिन डी की कमी का प्रभाव
विटामिन डी की कमी से कैल्शियम तथा फास्फोरस आँतों में शोषित नहीं हो पाते हैं,परिणामस्वरूप अस्थियों तथा दाँतों पर कैल्शियम नहीं जम पाता है। जिसके फलस्वरूप वे कमजोर हो जाते हैं।विटामिन हमारे शरीर न सिर्फ मांसपेशियों को मजबूत बनाता है, बल्कि शरीर में आस्टियोकैल्किन नामक प्रोटीन के निर्माण में भी मदद करता है, जो बोन मांस को बढाता है।
Disclaimer +
इस जानकारी की सटीकता , समयबद्धता और वास्तविकता सुनिश्चित करने का हर संभव प्रयास किया गया है । इसकी नैतिक जिम्मेदारी लेखक की नहीं है । इस लेख में उपलब्ध सभी सामग्री केवल पाठकों की जानकारी और ज्ञानवर्धन के लिए दी गई है। हमारा आपसे विनम्र निवेदन है कि किसी भी उपाय को आजमाने से पहले अपने चिकिस्तक से अवश्य संपर्क करें। हमारा उद्देश्य आपको रोचक और ज्ञानवर्धक जानकारी मुहैया कराना मात्र है। आपका चिकिस्तक आपकी सेहत के बारे में बेहतर जानता है और उसकी सलाह का कोई विकल्प नहीं है।
Posted by D.R. Singh on Wednesday 24 February 2016
यूं पाएं खर्राटों से मुक्ति
यूं पाएं खर्राटों से मुक्ति
खर्राटे भले ही आपकी गहरी नींद का संकेत हों, लेकिन आपके साथ रहने वाले शख्स को इनसे काफी परेशानी हो सकती है। इसके साथ ही खर्राटे कई बीमारियों का इशारा भी हो सकते हैं। इसलिए जरूरी है कि आप इनसे निजात पाने की कोशिश करें।जर्मन ऑटोलैरिंगोलॉजिस्ट एसोसिएशन के मुताबिक यदि सोते समय शरीर के ऊपरी हिस्से को हल्की सी ऊंची स्थिति में रखा जाए तो खर्राटों पर काबू पाया जा सकता है। एसोसिएशन के अनुसार वजन कम करने से भी इसमें मदद मिल सकती है।
क्या होेते हैं खर्राटे
समाचार एजेंसी डीपीए के मुताबिक यदि ये उपाय खर्राटे रोकने में कारगर नहीं होते हैं तो आप निद्रा श्वासरोध बीमारी से ग्रस्त हो सकते हैं।नाक और गले के एक जगह खुलने के स्थान पर सॉफ्ट टिश्यू के कारण सांस लेने का रास्ता आंशिक तौर पर बंद होने से आवाज आने लगती है। वैसे यह अभी तक तय नहीं हो पाया है कि किस वजह से सांस लेने के रास्ते के टिश्यू पर दबाव पड़ता है। इस बीमारी में सांस लेने के दौरान बीच-बीच में श्वास लेने की क्रिया खतरनाक रूप से रुक जाती है। इस बीमारी से पीडित लोगों को चिकित्सक कंटीन्युअस पॉजिटिव एयरवे प्रेशर (सीपीएपी) उपकरण के उपयोग की सलाह देते हैं। इस उपकरण में एक विशेष प्रकार का मास्क होता है। कभी-कभी तालु के कोमल ऊतक को कठोर बनाने के लिए एक छोटी सी शल्य चिकित्सा की जाती है। जर्मनी के ईएनटी विशेषज्ञों का कहना है कि इस चिकित्सा से मरीज अच्छी नींद ले पाते हैं और दिनभर थकान महसूस नहीं करते हैं।
कारण
खर्राटों का कोई एक निश्चित कारण नहीं होता। इसके लिए कई कारण जिम्मेदार हो सकते हैं जैसे जीभ का बड़ा होना, पुरानी सर्दी, नाक में मस्से होना या नाक का पर्दा सीधा न होना आदि कारणों से सांस में रुकावट पैदा हो जाती है। अधिक मोटापे के कारण भी खर्राटों की शिकायत हो सकती है। खर्राटे अधिक आने पर पालीसाइटमियो नामक रोग भी हो सकता है। इस रोग में रक्त कणों की संख्या बढ़ने के कारण खून में गांठे पड़ सकती हैं। यदि ये गाँठें उन रक्त वाहिनियों में पहुंच जाएं जो हृदय में रक्त ले जाती हैं तो व्यक्ति को हार्ट अटैक तथा ब्रेन हेमरेज जैसी बीमारियां हो सकती हैं।
इलाज
आपको इसकी समस्या से जल्द निजात पाने के लिए डॉक्टर की सलाह के साथ अपने वजन को कट्रोल में रखना होगा। कुछ मरीजों को करवट लेकर सोने से खर्राटे नहीं आते जबकि कुछ को नॉजल ड्रॉप्स डालने से आराम मिलता है। कुछ मरीजों को मशीन लगाने से भी आराम मिलता है। परेशानी बढ़ने पर गले का ऑपरेशन भी किया जाता है। यदि समस्या बहुत ज्यादा ही गंभीर हो तो गले में ट्रेकिया में छेद कर पीड़ित व्यक्ति को राहत दी जाती है।
क्या आपके घर में भी लोग सोते वक्त आपके खर्राटों से परेशान हैं? या आए दिन आपको अपने खर्राटों की वजह से शर्मिंदगी उठानी पड़ती है? इसके बावजूद आप अपनी इस समस्या से छुटकारा नहीं पा सके हैं? तो चलिए हम आपको कुछ ऐसे उपाय बताते हैं जिससे आप काफी हद तक इस समस्या से छुटकारा पा सकते हैं।
अलग-अलग पोजिशन अपनाएं
वैसे तो पीठ के बल सोना ही सोने का आदर्श तरीका है लेकिन कई बार इस मुद्रा में सोने से खर्राटे की आशंका बढ़ जाती है। इस मुद्रा में तालु व जीभ गले के ऊपरी भाग पर होते हैं। इससे ऊंची पिच में ध्वनि उत्पन्न होती है और यह खर्राटों में तब्दील हो जाती है। आप अगर करवट के बल सोएंगे तो खर्राटों की आशंका कम होगी।
वजन घटाएं
आपने कभी गौर किया हो तो हमेशा खर्राटे लेने वाले लोग अधिकतर मोटापे के शिकार हैं। ऐसे में गले के आस-पास बहुत अधिक वसा युक्त कोशिकाएं जमा हो जाती हैं, जिनसे गले में सिकुड़न होती है और खर्राटे की ध्वनि निकलती है। यह हवा के रास्ते को भी रोकता है जिससे भी सोते वक्त खर्राटे अधिक होते हैं। तो अगर आप खर्राटे से छुटकारा चाहते हैं तो वजन जरूर घटाएं।
सोने से पहले न लें अल्कोहल
कई दर्द निवारक दवाओं की तरह ही अल्कोहल भी शरीर की मांसपेशियों के खिंचाव को कम करती है और उन्हें विस्तार देती है। कई बार बहुत अधिक अल्कोहल के सेवन से गले की मांसपेशियां फैल जाती हैं जिससे खर्राटे उत्पन्न हो सकते हैं। तो सोते वक्त हो सकें तो अल्कोहल से बचें या फिर सीमित मात्रा में ही इसका सेवन करें।
धूम्रपान से बचें
धूम्रपान का फेफड़े पर सीधा प्रभाव पड़ता है। इससे फेफड़े की क्षमता पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। कभी-कभी धूम्रपान करने वाले व्यक्ति को सोते वक्त ऑक्सीजन की कमी लगती है। इस स्थिति को स्लीप ऐप्नीआ यानी निद्रा अश्वसन कहते हैं। इस स्थिति में कई बार ऑक्सीजन प्राप्त करने के लिए भी शरीर खर्राटे लेता है।
साइनस भी है वजह
खर्राटे की एक वजह साइनस बढ़ने से नाक के छिद्रों का जाम हो जाना भी हो सकती है। इतना ही नहीं, खर्राटे की ध्वनि बढ़ने पर भी नाक के रास्ते का प्रभाव पड़ता है। ऐसे में अगर आप साइनस के मरीज हैं तो सावधानियां हमेशा बरतें। यदि आपको जुकाम हुआ है या साइनस बढ़ने से परेशान हैं तो सोने के पहले भाप जरूर लें जिससे सारी गंदगी बाहर आ जाए और सांस लेने में आसानी हो।
तकिये पर भी दें ध्यान
अगर आप अपनी तकिया की खोल को समय-समय पर नहीं बदलते या साफ नहीं करते तो हो सकता है कि आप के खर्राटों की एक वजह यह भी हो। कई बार सिर से रूसी या बाल तकिया पर गिरे होते हैं जो कई सूक्ष्म जीवों के लिए जमीन तैयार कर देते हैं। जब हम सांस लेते हैं तो ये एलर्जी शरीर की श्वास संबंधी क्षमता को खत्म कर देती है जिससे निद्रा अश्वसन या स्लीप ऐपनीआ की समस्या होती है और खर्राटे तेज हो जाते हैं।
ज्यादा से ज्यादा पानी पीएं
जब आपके शरीर में पानी की कमी होती है तो नाक के रास्ते की नमी सूख जाती है। ऐसे में साइनस हवा की गति को श्वास तंत्र में पहुंचने के बीच में सहयोग नहीं कर पाता। ऐसे में सांस लेना कठिन हो जाता है और खर्राटे की प्रवृत्ति बढ़ जाती है। ऐसे में पूरे दिन भरपूर मात्रा में पानी पीएं, सेहतमंद रहें और खर्राटे से कोसों दूर रहें।
खर्राटों से परेशान लोगों के लिए राहत की खबर है, अब खर्राटों का इलाज महज पांच मिनट में हो सकता है। बिना सर्जरी के इस इलाज में खर्राटों का ही नहीं, खर्राटों से हो सकने वाली दिल की बीमारियों को भी रोका जा सकेगा। डॉक्टरों के अनुसार खर्राटों से व्यक्ति हाई ब्लड प्रेशर का मरीज भी बन सकता है और हार्ट पेशेंट भी। एक मेडिकल सर्वेक्षण के मुताबिक दुनियाभर में आधी से अधिक आबादी खर्राटे लेती है, लेकिन इनमें से करीब 25 फीसदी लोग बहुत गहरे और तेज आवाज में खर्राटे लेते हैं। सर्वेक्षण में यह भी सामने आया है कि मोटापे या हाइपोथाइरॉइडिज्म से ग्रस्त लोगों में खर्राटे लेने या खर्राटों के कारण दिल की बीमारी होने की संभावना अधिक होती है।
यह है नवीनतम इलाज
जीएमएसएच-१६ के ईएनटी विभाग में विशेषज्ञ डॉ. वीके शर्मा के मुताबिक रेडियो फ्रिक्वेंसी ट्रीटमेंट नवीनतम इलाज है। इसमें रेडियो फ्रिक्वेंसी के इस्तेमाल से सांस के रास्ते में रुकावट बनने वाले टिश्यू को रास्ते से हटाया जाता है। रेडियो फ्रिक्वेंसी की मदद से 95 डिग्री तक तापमान बनाकर गरमी पैदा की जाती है जो सामान्य टिश्यू को नुकसान पहुंचाए बिना टारगेट टिश्यू के वॉल्यूम को कम कर देती है। इस प्रक्रिया में ५ से ७ मिनट का समय ही लगता है और मरीज उसी दिन काम पर लौट सकता है।
पहले क्या था इलाज
डॉ. वीके शर्मा के मुताबिक खर्राटों के इलाज के कई तरीके इस्तेमाल किए जाते रहे हैं। इनमें दवाओं से लेकर नाक पर स्ट्रैप, गले की नली को खुला रखने का क्लिप और लेजर के जरिये सर्जरी किया जाना भी था।
यह करें, नहीं आएंगे खर्राटे
पीठ के बल सोने और लेटने से बचें
करवट लेकर सोएं।
वजन कम करना सबसे जरूरी और असरदार है।
जुकाम होने पर पूरा इलाज कराएं।
नशा करने से बचें।
नींद लाने वाली दवाओं के असर से भी खर्राटे आते हैं।
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इस जानकारी की सटीकता , समयबद्धता और वास्तविकता सुनिश्चित करने का हर संभव प्रयास किया गया है । इसकी नैतिक जिम्मेदारी लेखक की नहीं है । इस लेख में उपलब्ध सभी सामग्री केवल पाठकों की जानकारी और ज्ञानवर्धन के लिए दी गई है। हमारा आपसे विनम्र निवेदन है कि किसी भी उपाय को आजमाने से पहले अपने चिकिस्तक से अवश्य संपर्क करें। हमारा उद्देश्य आपको रोचक और ज्ञानवर्धक जानकारी मुहैया कराना मात्र है। आपका चिकिस्तक आपकी सेहत के बारे में बेहतर जानता है और उसकी सलाह का कोई विकल्प नहीं है।
Posted by D.R. Singh on Wednesday 24 February 2016
कुछ ऐसे स्पाइसी स्नैक्स जिनमें है मात्र 80 कैलोरी
कुछ ऐसे स्पाइसी स्नैक्स जिनमें है मात्र 80 कैलोरी
अक्सर दिन भर डाइट कंट्रोल के बाद शाम की चाय के साथ लोग अक्सर बेहिसाब कैलोरी वाले स्नैक्स लेते हैं, और फिर अपनी भूख का रोना रोते रहते हैं, कुछ आहारों से हम केवल इसलिए दूरी बना लेते हैं कि उनमें अधिक मात्रा में कैलोरी होती है, और उसका सेवन करने से वजन बढ़ने का खतरा होता है ,लेकिन कुछ आहार ऐसे भी हैं जिनमें कैलोरी की मात्रा कम होती है। कम कैलोरी के आहारों का सेवन हमें स्वाद भी देता है और मोटापे की समस्या से भी बचाता है। इस लेख में हम 80 से भी कम कैलोरी वाले आहारों के बारे में जानेंगें ।
1 कप टमाटर का सूप
टमाटर में भरपूर मात्रा मे रोगों से लड़ने वाले न्यूट्रीएंट्स होते हैं, जबकि इसमे कैलोरी बेहद कम होती है। टमाटर के एक कप सूप मे सिर्फ 74 कैलोरी होती है। कोलेस्ट्रॉल जीरो और सैचुरेटेड फैट 1 ग्राम से भी कम होता है। लेकिन यदि आप बाजार से रेडीमेड सूप खरीदते हैं तो इसका लेबल जरूर चेक करें और वही सूप चुनें जिसमे फैट, कैलोरी और सोडियम की मात्रा कम हो।
2 - बेक किया हुआ आधा आलू
मीडियम साइज का आधा आलू माइक्रोवेव मे बेक करें। इसका छिलका उतारने की जरूरत नहीं, क्योंकि आलू के छिलके मे भरपूर न्यूट्रीएंट होता है। इसका स्वाद बढ़ाने के लिए इसपर फ्रेश ग्रीन चटनी डालें और सिर्फ 80 कैलोरी के भीतर इस लाजवाब स्नैक्स का मजा लें। आलू मे विटामिन सी भी खूब मिलता है।
3 - 1/3 कप हरी सोयाबीन
हरी सोयाबीन सबसे हेल्दी स्नैक्स मे से एक है। इसके 1/3 कप मे 8 ग्राम प्रोटीन और 4 ग्राम फाइबर होता है। इसके साथ ही बोनस के रूप मे यह आपको आयरन की डेली डोज़ के 10% हिस्से की पूर्ति भी करता है। इसे आप कच्चा या हल्का ब्वायल करके खा सकते हैं।
4 - पॉपकॉर्न
जब भूख बड़ी हो और कम कैलोरी मे ज्यादा स्नैक्स खाने का मन है तो आपकी यह जरूरत पॉपकॉर्न पूरी कर सकता है। माइक्रोवेव मे बनने वाले कई ब्रांड के पॉपकॉर्न मे बेहद कम कैलोरी होती है। इसे खरीदते टाइम कैलोरी का लेबल जरूर पढ़ें। इसमे फाइबर काफी ज्यादा होता है, जो आपको लंबे टाइम तक भूख नहीं लगने देता।
5 - बादाम
आप कहीं रास्ते मे हैं और भूख सता रही है तो नट्स से बढ़िया ऑप्शन और क्या हो सकता है। यदि आप लंबे टाइम के लिए घर या ऑफिस से बाहर निकलें तो अपने पास कुछ बादाम रखें। भूख लगने पर आप 10 -12 बादाम खाकर अपनी भूख मिटा सकते हैं, वह भी 100 कैलोरी के मार्क तक पहुंचे बिना। बादाम मे फाइबर और प्रोटीन भरपूर होता है जो तुरंत भूख मिटाता है।
6 - पिस्ता
अक्सर लोग पिस्ता को फैटी समझकर इसे खाने से बचते हैं। लेकिन आपको इससे डरने की कोई जरूरत नहीं है, क्योंकि इसका अधिकतर फैट अनसैचुरेटेड या ‘गुड’ फैट होता है। 20 पिस्ता खाएं और और सिर्फ 80 कैलोरी बढ़ाएं वो भी 1 ग्राम से भी कम सैचुरेटेड फैट के साथ। इतना ही नहीं, पिस्ता मे प्रोटीन, फाइबर, कई जरूरी विटामिन्स और मिनरल की भरपूर मात्रा होती है। लेकिन हां, सोडियम के अनहेल्दी डोज़ से बचने के लिए इसे रॉ या बिना नमक के ड्राई रोस्ट करके खाएं।
7 - बेक किया हुआ सेब
सेब सबसे हेल्दी स्नैक्स मे से एक है, और इसके टेस्ट मे ट्विस्ट लाने के कई तरीके हैं। बेक किया हुआ सेब डेजर्ट की तरह लगता है और इसमे फ्रेश सेब की ही तरह विटामिन और फाइबर होता है। इसमे आप थोड़ा सा दालचीनी पाउडर भी डाल सकते हैं। इससे बिना कैलोरी बढ़े टेस्ट बदल जाएगा।
Posted by D.R. Singh on Saturday 20 February 2016
जानें क्या वास्तव में कोल्ड (शर्दी-जुकाम) के लिए कारगर है विटामिन सी
जानें क्या वास्तव में कोल्ड (शर्दी-जुकाम) के लिए कारगर है विटामिन सी
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कफ और कोल्ड की समस्या होने पर आपको विटामिन सी की गोलियां की बोतल या ऑरेंज जूस दिखाई देता है। लेकिन क्या वास्तव में विटामिन सी आपके लक्षणों को रोकने या इलाज करने में मददगार होता है। आइए इस आर्टिकल के माध्यम से इस बात की जानकारी लेते हैं।
विटामिन सी क्या है?
विटामिन सी एक ऐसा पोषक तत्व है, जो शरीर को मजबूत और स्वस्थ रखने में मददगार होता है। यह हड्डियों, मांसपेशियों और रक्त वाहिकाओं को स्वस्थ बनाये रखने में मदद करता है। साथ ही यह आयरन के अवशोषण में मदद करता है।
आपको विटामिन सी फल और सब्जियों विशेष रूप से संतरे और अन्य खट्टे फलों से मिलता है। इसके अलावा विटामिन सी की गोलियां या चूसने वाले गोलियों के रूप में भी बाजार में आसानी से उपलब्ध हो जाता है।
क्या विटामिन सी कोल्ड के लक्षणों को दूर करता है?
इस विषय पर बहुत से अध्ययन हुए हैं, लेकिन निष्कर्ष अनुरूप नहीं है। कुल मिलाकर, विशेषज्ञों ने पाया कि अगर आप कोल्ड के इलाज के लिए विटामिन सी का उपयोग करते हें तो इससे आपको कोई लाभ नहीं होता है।
2010 में, शोधकताओं ने सभी अध्ययनों को देखा और पाया कि विटामिन सी हर दिन लेने से जुकाम को रोका नहीं जा सकता। लेकिन कुछ मामलों में लक्षणों में सुधार किया जा सकता है। हालांकि बीमार होने के संकेत दिखने के बाद विटामिन सी लेना आपकी बिल्कुल भी मदद नहीं कर सकता है।
लेकिन विटामिन सी नियमित रूप से लेने से आपकी इम्यूनिटी स्ट्रोंग होती है और स्ट्रोंग इम्यूनिटी वाले लोगों को कोल्ड की समस्या अन्य लोगों की तुलना में कम होती है। यानी नियमित रूप से विटामिन सी लेने वाले लोगों में कोल्ड का जोखिम लगभग आधा रहता है।
इसका क्या अर्थ है
अगर आप नियमित रूप से 0.2 ग्राम विटामिन सी लेते हैं तो आपको कोल्ड होने की संभावना बहुत कम होती है लेकिन इसका असर एक या दो दिन में जल्दी खत्म हो जाता है।
क्या ये सुरक्षित है?
सामान्य रूप से, अगर आप फल और सब्जियों के माध्यम से विटामिन सी लेते हैं तो इसका कोई नुकसान नहीं होता। ज्यादातर लोगों के लिए, अगर सिफारिश राशि में सप्लीमेंट लिये जाये तो भी कोई नुकसान नहीं होता। लेकिन विटामिन सी की खुराक प्रतिदिन 2,000 मिलीग्राम से अधिक ली जाये तो यह किडनी स्टोन, उल्टी और डायरिया का कारण हो सकती है। इसके अलावा आपको खून में कमी या एनीमिया की भी शिकायत हो सकती है। इसलिए विटामिन सी की गोलियां लेने से पहले अपने डॉक्टर से सलाह लें और अन्य पूरक आहार के बारे में जानकारी लें।
विटामिन सी के स्रोत
खट्टे रसदार फल जैसे आंवला, नारंगी, नींबू, अनानास, संतरा, बेर, कटहल, शलगम, पुदीना, अंगूर, टमाटर, आदि एवं अमरूद, सेब, केला, मूली के पत्ते, मुनक्का, दूध, चुकंदर, चौलाई, बंदगोभी, हरा धनिया, और पालक विटामिन सी के अच्छे स्रोत हैं। इसके अलावा दालें भी विटामिन सी का स्रोत होती हैं।
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इस जानकारी की सटीकता , समयबद्धता और वास्तविकता सुनिश्चित करने का हर संभव प्रयास किया गया है । इसकी नैतिक जिम्मेदारी लेखक की नहीं है। इस लेख में उपलब्ध सभी साम्रगी केवल पाठकों की जानकारी और ज्ञानवर्धन के लिए दी गई है। हमारा आपसे विनम्र निवेदन है कि किसी भी उपाय को आजमाने से पहले अपने चिकिस्तक से अवश्य संपर्क करें। हमारा उद्येश्य आपको रोचक और ज्ञानवर्धक जानकारी मुहैया कराना मात्र है। आपका चिकिस्तक आपकी सेहत के बारे में बेहतर जानता है और उसकी सलाह का कोई विकल्प नहीं है।
Posted by D.R. Singh on Sunday 14 February 2016
दोपहर बाद आलस्य आने के कारण और उससे छुटकारा पाने के उपाय
दोपहर बाद आलस्य आने के कारण और उससे छुटकारा पाने के उपाय

दोपहर के बाद कई कोशिशों के बावजूद आप अपनी नींद पर काबू नहीं कर पाते हैं और आपको आलस्य आता है। इसका असर आपके काम पर पड़ता है। अधूरी नींद, अवसाद, ओवरईटिंग, व्यायाम न करना, कुछ बीमारियां आदि प्रमुख कारण हैं जिनके कारण आपको दोपहर बाद आलस्य आता है। विस्तार से जानते हैं उन प्रमुख कारणों के बारे में जिनके कारण आपको नींद आती है और इससे उबरने के तरीके भी जानिये।
१ - नींद पूरी न होना -
रात में देर से सोने और सुबह जल्दी उठने के कारण पूरे दिन नींद आना सामान्य बात है। बहुत कम नींद लेना सेहत और एकाग्रता दोनों पर असर डालता है। इसलिए एक वयस्क को रात में कम से कम 7 से 8 घंटे की नींद लेनी चाहिए। शहरी जीवनशैली के बीच शरीर की इस सबसे आसान व प्राकृतिक जरूरत को पूरा करना मुश्किल होता जा रहा है। इसके कारण दोहपर के बाद आलस्य आता है।
२ - ब्रेकफास्ट (नाश्ता) न करना -
सुबह के वक्त नाश्ता करने से हमें न केवल एनर्जी मिलती है बल्कि इसके कारण हम पूरे दिन ऊर्जावान बने रहते हैं। लेकिन अगर आपने सुबह के वक्त पौष्टिक व ताज़ा नाश्ता नहीं किया है तो इसके कारण दोहपर के बाद आपको नींद सतायेगी। इसलिए सुबह का नाश्ता करना न भूलें।
३ - ओवरईटिंग के कारण -
लंच में अधिक और अपौष्टिक खाना खाने के कारण दोपहर के बाद आलस्य आना स्वाभाविक है। इसके अलावा दोपहर में यदि आपने गरिष्ठ और जल्दी न पचने वाले खाना खाया है तो इसके कारण भी दोपहर में आलस्य आता है। इसलिए दोपहर के लंच में ऐसा खाना खायें जो आसानी से पच जाये और पौष्टिक हो । सलाद, हरी सब्जियों, फलों का अधिक मात्रा में सेवन करें। मीट, मछली, मसालेदार आदि हैवी जंक फूड के सेवन से बचें।
४ - हाइपोथाइरॉयडिज्म के कारण
थायरायड एक ऐसी ग्रंथि है, जो मेटाबॉलिज्म को काबू में रखती है, इस प्रक्रिया के तहत शरीर भोजन को पचा कर ऊर्जा में बदलता है। जब यह ग्रंथि असक्रिय हो जाती है तो इसे हाइपोथाइरॉएडिज्म कहते हैं। इसके कारण मेटाबॉलिज्म धीमा हो जाता है, और व्यक्ति को थकावट होती है और उसका वजन बढ़ने लगता है। अगर कोई व्यक्ति इस समस्या से ग्रस्त है तो उसे दोपहर बाद आलस्य आयेगा।
५ - तनाव और अवसाद के कारण
तनाव का सबसे नकारात्मक असर हमारी नींद पर पड़ता है। अगर कोई व्यक्ति तनाव और अवसाद से ग्रस्त है तो इसके कारण उसे अच्छी नींद नहीं आयेगी, थकावट, सिरदर्द और भूख न लगने जैसी समस्यायें भी होंगी। इसलिए अगर तनाव से ग्रस्त हैं तो इससे उबरने की कोशिश करें।
६ -व्यायाम न करना
अगर आप व्यायाम करने में आलस्य करेंगे तो पूरा दिन आलस्य में ही बीतेगा। दोपहर के बाद नींद आने के लिए जिम्मेदार प्रमुख कारणों में से व्यायाम न करना भी एक कारण है। इसलिए सुबह के वक्त व्यायाम के लिए 30-40 मिनट जरूर निकालें।
७ - कुछ बीमारियां
दिल की बीमारी, स्लीप एप्नीया, एनीमिया, यूरीनरी इंफेक्शन आदि कई स्वास्थ्य समस्यायें हैं जिनके कारण भरपूर नींद लेने के बाद भी आपको दोपहर के बाद आलस्य के साथ नींद भी सताती है। इसलिए अगर भरपूर सोने के बाद भी आपका मन दिन में सोने के लिए बेताब रहता है तो इस बीमारियों की जांच जरूर करायें।
८ - दोपहर के आलस्य को कैसे करें दूर
दोपहर के बाद नींद आने की समस्या को आप आसानी से दूर कर सकते हैं। हो सके तो ऑफिस में ही 30 मिनट की पॉवर नैप लें, 40 मिनट से अधिक समय तक एक जगह कुर्सी पर न बैठें, थोड़ा सा टहले, लंच के बाद टहलें, ब्रेकफास्ट जरूर करें, व्यायाम को अपनी दिनचर्या बनायें, नींद आने पर कॉफी का सेवन करें, भरपूर नींद लें और समय-समय पर चिकित्सक से परामर्श लें।
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इस जानकारी की सटीकता , समयबद्धता और वास्तविकता सुनिश्चित करने का हर संभव प्रयास किया गया है । इसकी नैतिक जिम्मेदारी लेखक की नहीं है। इस लेख में उपलब्ध सभी साम्रगी केवल पाठकों की जानकारी और ज्ञानवर्धन के लिए दी गई है। हमारा आपसे विनम्र निवेदन है कि किसी भी उपाय को आजमाने से पहले अपने चिकिस्तक से अवश्य संपर्क करें। हमारा उद्येश्य आपको रोचक और ज्ञानवर्धक जानकारी मुहैया कराना मात्र है। आपका चिकिस्तक आपकी सेहत के बारे में बेहतर जानता है और उसकी सलाह का कोई विकल्प नहीं है।
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Posted by D.R. Singh on Sunday 14 February 2016
