जानिये शरीर में क्यों हो जाती है विटामिन डी की कमी

जानिये शरीर में क्यों हो जाती है विटामिन डी की कमी

विटामिन डी से ही हड्डियां मजबूत होती हैं और अगर इसकी कमी हो जाये तो हमारा मूल ढांचा प्रभावित हो जाता है, शरीर में विटामिन डी की कमी के पीछे के कारणों के बारे में जानने के लिए यह लेख पढ़ें।

 

विटामिन डी 

वसा-घुलनशील प्रो-हार्मोन का एक समूह होता है। इसके दो प्रमुख रूप हैं:विटामिन डी (या अर्गोकेलसीफेरोल) एवं विटामिन डी३ (या कोलेकेलसीफेरोल) सूर्य के प्रकाश, खाद्य एवं अन्य पूरकों से प्राप्त विटामिन डी निष्क्रीय होता है। इसे शरीर में सक्रिय होने के लिये कम से कम दो हाईड्रॉक्सिलेशन अभिक्रियाएं वांछित होती हैं। शरीर में मिलने वाला कैल्सीट्राईऑल (१,२५-डाईहाईड्रॉक्सीकॉलेकैल्सिफेरॉल) विटामिन डी का सक्रिय रूप होता है। त्वचा जब धूप के संपर्क में आती है तो शरीर में विटामिन डी निर्माण की प्रक्रिया आरंभ होती है। यह मछलियों में भी पाया जाता है। विटामिन डी की मदद से कैल्शियम को शरीर में बनाए रखने में मदद मिलती है जो हड्डियों की मजबूती के लिए अत्यावश्यक होता है। इसके अभाव में हड्डी कमजोर होती हैं व टूट भी सकती हैं। छोटे बच्चों में यह स्थिति रिकेट्स कहलाती है और व्यस्कों में हड्डी के मुलायम होने को ओस्टीयोमलेशिया कहते हैं। इसके अलावा, हड्डी के पतला और कमजोर होने को ओस्टीयोपोरोसिस कहते हैं। इसके अलावा विटामिन डी कैंसर, क्षय रोग जैसे रोगों से भी बचाव करता है।

डेनमार्क के शोधकर्ताओं के अनुसार विटामिन डी शरीर की टी-कोशिकाओं की क्रियाविधि में वृद्धि करता है, जो किसी भी बाहरी संक्रमण से शरीर की रक्षा करती हैं। इसकी मानव प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत करने में मुख्य भूमिका होती है और इसकी पर्याप्त मात्रा के बिना प्रतिरक्षा प्रणालीकी टी-कोशिकाएं बाहरी संक्रमण पर प्रतिक्रिया देने में असमर्थ रहती हैं। टी-कोशिकाएं सक्रिय होने के लिए विटामिन डी पर निर्भर रहती हैं।  जब भी किसी टी-कोशिका का किसी बाहरी संक्रमण से सामना होता है, यह विटामिन डी की उपलब्धता के लिए एक संकेत भेजती है। इसलिये टी-कोशिकाओं को सक्रिय होने के लिए भी विटामिन डी आवश्यक होता है। यदि इन कोशिकाओं को रक्त में पर्याप्त विटामिन डी नहीं मिलता, तो वे चलना भी शुरू नहीं करतीं हैं।

अधिकता: विटामिन डी की अधिकता से शरीर के विभिन्न अंगों, जैसे गुर्दों में, हृदय में, रक्त रक्त वाहिकाओं में और अन्य स्थानों पर, एक प्रकार की पथरी उत्पन्न हो सकती है। ये विटामिन कैल्शियम का बना होता है, अतः इसके द्वारा पथरी भी बन सकती है। इससे रक्तचाप बढ सकता है, रक्त मेंकोलेस्टेरॉल बढ़ सकता है और हृदय पर प्रभाव पड़ सकता है। इसके साथ ही चक्कर आना, कमजोरी लगना और सिरदर्द, आदि भी हो सकता है। पेट खराब होने से दस्त भी हो सकता है।

 

विटामिन डी के स्रोत

 

इसके मुख्य स्रोतों में अंडे का पीला भाग, मछली के तेल, विटामिन डी युक्त दूध और मक्खन होते हैं। इनके अलावा मुख्य स्रोत धूप सेंकना होता है।दुग्धशाला उत्पाद। बदन में धूप सेकने से कुछ एक विटामिन त्वचा में भी पैदा हो सकते है।

 

विटामिन डी की भूमिका

 

रक्त में कैल्सियम का स्तर बनाए रखना हडिडयों के संवर्द्धन  के लिए आवश्यक है। 5-10 मि. ग्रा कैल्सियम की आवश्यकता शरीर की हड्डियों को मजबूत बनाये रखने के प्रतिदिन आवश्यक होता है।

 

बार-बार बीमार होने से बचाता है विटामिन डी

शरीर के कमजोर प्रतिरक्षा तंत्र के कारण अगर आप बार-बार बीमार पड़ते हैं, तो आपको जरूरत है, ढेर सारे विटामिन डी के सेवन की। वैज्ञानिकों ने दावा किया है कि सूर्य की रोशनी में बनने वाला विटामिन डी प्रकृति का सर्वश्रेष्ठ प्रतिजैविक है, जो शरीर के प्रतिरक्षा तंत्र को मजबूत करता है।

डेनमार्क के शोधकर्ताओं ने अपने शोध में दावा किया है कि विटामिन डी शरीर की टी कोशिकाओं की क्रियाविधि को बढ़ाता है, जो किसी भी बाहरी संक्रमण से शरीर को बचाती हैं। शोधकर्ताओं के अनुसार विटामिन डी मानव प्रतिरक्षा तंत्र को मजबूत करने में अहम है और इसकी पर्याप्त मात्रा के बिना प्रतिरक्षा तंत्र की टी कोशिकाएं बाहरी संक्रमण पर प्रतिक्रिया देने में असमर्थ रहती हैं।

शोधकर्ताओं ने बताया कि टी कोशिकाएं सक्रिय होने के लिए विटामिन डी पर निर्भर रहती हैं। द डेली टेलीग्राफ ने कोपनहेगन विश्वविद्यालय के मुख्य शोधकर्ता प्रो कार्स्टन गेस्लर के हवाले से कहा जब भी किसी टी कोशिका का किसी बाहरी संक्रमण से सामना होता है, यह विटामिन डी की तलाश के लिए एक सिगनल भेजती है। उन्होंने बताया इसका मतलब है कि टी कोशिकाओं को सक्रिय होने के लिए भी विटामिन डी की जरूरत है। अगर इन कोशिकाओं को खून में पर्याप्त विटामिन डी नहीं मिलता, तो वह चलना भी शुरू नहीं करतीं।

विटामिन-डी की कमी के लक्षण

 

विटामिन-डी शरीर के विकास, हड्डियों के विकास और स्वास्थ्य के लिए बहुत जरूरी है। धूप के संपर्क में आने पर त्वचा इसका निर्माण करने लगती है। हालांकि यह विटामिन खाने की कुछ चीज़ों से भी प्राप्त होता है,लेकिन इनमें यह बहुत ही कम मात्रा में होता है। केवल इनसे विटामिन-डी की जरूरत पूरी नहीं हो जाती है। आइए जानते हैं विटामिन-डी की कमी के लक्षण क्या हैं?

 

वयस्कों में विटामिन-डी की कमी के लक्षण 

- दर्द या तेज दर्द

- कमजोरी एवं ओस्टियोमेलेशिया 

- हड्डियों का दर्द (आमतौर पर कूल्हों, पसलियों और पैरों आदि की हड्डियों में) 

खून में विटामिन-डी की कमी होने पर ये आशंकाएं प्रबल होती हैं। 

- कार्डियोवेस्क्युलर रोगों से मृत्यु 

- याददाश्त कमजोर होना 

- बच्चों के अस्थमा से गंभीर रूप से प्रभावित होना एवं कैंसर।

विटामिन-डी मधुमेह, उच्च रक्तचाप, ग्लुकोल इनटॉलरेंस और मल्टिपल स्क्लेरोसिस आदि बीमारियों से बचाव और इलाज में महत्वपूर्ण हो सकता है।

 

बच्चों में विटामिन-डी की कमी के लक्षण 



- शिशुओं में इसकी कमी होने पर मांसपेशियों में मरोड़े, सांस लेने में परेशानी और दौरे आने की परेशानी हो सकती है। उनके शरीर में कैल्शियम की भी कमी हो जाती है। सांस की तकलीफ के कारण बच्चे की पसलियां (रिब केज) नर्म रह जाता है और आस-पास की मांसपेशियां भी कमजोर रह जाती हैं।

- विटामिन-डी की गंभीर कमी होने से उनके पैरों की हड्डियां और खोपड़ी कमजोर रह जाती हैं। छूने पर यह हड्डियां नर्म महसूस होती हैं। हड्डियों से शरीर का बनुयादी ढांचा तैयार होता है, लेकिन रिकेट्स जैसी बीमारी में हड्डियां लचीली हो जाती हैं। पैरों की हड्डियां कमजोर हो कर मुड़ने लगें तो यह स्थिति रिकेट्स कहलाती है।

- समय पर दांत न आना विटामिन डी की कमी का ही लक्षण है। 

बच्चों में विटामिन-डी विटामिन-डी की कमी के कई कारण हो सकते हैं

- लंबे समय तक शरीर को यह पर्याप्त मात्रा में न मिल पाना। यह समस्या उन लोगों में अधिक होती है, जो पूर्णतः शाकाहारी आहार ही लेते हैं। प्राकृतिक रूप से विटामिन-डी केवल पशुओं से मिलने वाले आहार से ही प्राप्त होता है, इसलिए केवल शाकाहारी भोजन लेने वालों में विटामिन-डी की कमी की आशंका रहती है। शरीर पर धूप न लगना। 

- त्वचा का रंग बहुत गहरा होना। त्वचा का गहरा रंग मिलेनिन नामक पिगमेंट के कारण होता है। मिलेनन बहुत अधिक होने के कारण धूप लगने पर त्वचा में विटामिन-डी का निर्माण ठीक से नहीं हो पाता।

- किडनी विटामिन-डी को उसके सक्रिय रूप में परिवर्तित न कर पाएं तो शरीर में इसकी कमी होने लगती है। उम्र बढ़ने के साथ किडनी की कार्यक्षमता प्रभावित होने लगती है, जिससे यह विटामिन-डी को परिवर्तित नहीं कर पाती। पाचन तंत्र इसे अवशोषित नहीं कर पाए तो भी इसकी कमी हो जाती है। कुछ बीमारियों के कारण पाचन तंत्र की विटामिन-डी अवशोषित करने की क्षमता प्रभावित होती है। 



मोटापा :

 

रक्त में मौजूद विटामिन-डी को फैट की कोशिकाएं अवशोषित कर लेती हैं, जिससे शरीर को इसका फायदा नहीं मिल पाता है।

- रक्त में विटामिन-डी का स्तर जानने के लिए जांच की जा सकती है। अपने चिकित्सक से इसके बारे में जान सकते हैं।

 

बच्चों को विटामिन-डी की कमी न हो, इसके लिए ध्यान रखें 



- गर्भावस्था में महिला के शरीर में विटामिन-डी की कमी होने पर शिशु में भी इसकी कमी की आशंका होती है। जिन महिलाओं का रंग गहरा होता है, उन्हें इसकी आपूर्ति का विशेष ध्यान रखना चाहिए।

- समय से पहले जन्में शिशुओं में इसकी कमी हो सकती है। केवल स्तनपान करने वाले शिशुओं में विटामिन-डी की कमी हो सकती है। जिन बच्चों को फॉर्मूला मिल्क दिया जाता है, उनमें यह आशंका और भी बढ़ जाती है। 

- मोटापा : मोटापा बढ़ने के साथ ही शरीर में विटामिन-डी का स्तर घटता जाता है। ऐसे लोगों को विटामिन-डी की आपूर्ति के साथ ही मोटापा घटाने की ओर भी ध्यान देना चाहिए, क्योंकि रक्त में मौजूद विटामिन-डी को फैट कोशिकाएं अवशोषित कर लेती हैं और समस्या जस की तस बनी रह सकती है या फिर बदतर भी हो सकती है।

विटामिन डी की कमी के कारण

विटामिन डी हमारे संपूर्ण स्वास्थ्य के लिए जरूरी है। यह शरीर में कैल्शियम के स्तर को नियंत्रित करने का काम करता है, जो तंत्रिका तंत्र की कार्य प्रणाली और हड्डियों की मजबूती के लिए जरूरी है। यह शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाता है। विटामिन डी के लक्षण एकदम उभर कर सामने नहीं आते, इसी वजह से लोगों को समय पर विटामिन डी की कमी से होने वाले रोगों का पता ही नहीं चल पाता। इसलिए विटामिन डी की नियमित जांच और विटामिन डी युक्त भोजन लेना जरूरी है।

सूर्य की किरणे

विटामिन-डी का मुख्य स्रोत सूर्य की किरणे हैं, जो शरीर में जाने के बाद रिएक्शन कर विटामिन-डी बनाती हैं. जो लोग धूप में नहीं रहते या उनको किसी भी कारण धूप नहीं मिलती तो उनके शरीर में इसकी कमी हो जाती है। इसके अलावा सही खानपान का अभाव भी इसकी कमी का कारण है। खून में विटामिन-डी की मात्रा 20 मोनोग्राम प्रति मिलीलीटर से अधिक होनी चाहिए, इससे कम होना नुकसानदायक है।

मोटापा

विटामिन डी हमारे संपूर्ण स्वास्थ्य के लिए जरूरी है। यह शरीर में कैल्शियम के स्तर को नियंत्रित करने का काम करता है, जो तंत्रिका तंत्र की कार्य प्रणाली और हड्डियों की मजबूती के लिए जरूरी है। यह शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाता है। विटामिन डी के लक्षण एकदम उभर कर सामने नहीं आते, इसी वजह से लोगों को समय पर विटामिन डी की कमी से होने वाले रोगों का पता ही नहीं चल पाता। इसलिए विटामिन डी की नियमित जांच और विटामिन डी युक्त भोजन लेना जरूरी है।

त्वचा का रंग गहरा होना

त्वचा का गहरा रंग मिलेनिन नामक पिगमेंट के कारण होता है। मिलेनन बहुत अधिक होने के कारण धूप लगने पर त्वचा में विटामिन-डी का निर्माण ठीक से नहीं हो पाता। कुछ शोधो का मानना है कि बढती उम्र मे गहरे रंग की त्वचा वालों के विटामिन डी की कमी की समस्या का सामना करना पड़ सकता है। 

किडनी परिवर्तित न कर पाएं

किडनी विटामिन-डी को उसके सक्रिय रूप में परिवर्तित न कर पाएं तो शरीर में इसकी कमी होने लगती है। उम्र बढ़ने के साथ किडनी की कार्यक्षमता प्रभावित होने लगती है, जिससे यह विटामिन-डी को परिवर्तित नहीं कर पाती। पाचन तंत्र इसे अवशोषित नहीं कर पाए तो भी इसकी कमी हो जाती है। कुछ बीमारियों के कारण पाचन तंत्र की विटामिन-डी अवशोषित करने की क्षमता प्रभावित होती है।

शाकाहारी होना

प्राकृतिक रूप से विटामिन-डी केवल पशुओं से मिलने वाले आहार से ही प्राप्त होता है, इसलिए केवल शाकाहारी भोजन लेने वालों में विटामिन-डी की कमी की आशंका रहती है।यह समस्या उन लोगों में अधिक होती है, जो पूर्णतः शाकाहारी आहार ही लेते हैं।

शारीरिक क्रियाशीलता

आजकल की डेस्क जॉब ने हमारी शारीरिक क्रियाशीलता को कम कर दिया जिससे हमारी पाचनशक्ति प्रभावित हो गई है। इससे आहारों के अलावा  तेज चलने, दौडऩे, सीढ़ी चढ़ने और डांस करने से हड्डियों की मजबूती बनी रहती है और वे कमजोर नहीं होतीं। साथ ही मांसपेशियों की मजबूती भी बनी रहती है।

विटामिन डी की कमी का प्रभाव

विटामिन डी की कमी से कैल्शियम तथा फास्फोरस आँतों में शोषित नहीं हो पाते हैं,परिणामस्वरूप अस्थियों तथा दाँतों पर कैल्शियम नहीं जम पाता है। जिसके फलस्वरूप वे कमजोर हो जाते हैं।विटामिन हमारे शरीर न सिर्फ मांसपेशियों को मजबूत बनाता है, बल्कि शरीर में आस्टियोकैल्किन नामक प्रोटीन के निर्माण में भी मदद करता है, जो बोन मांस को बढाता है।

 

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Posted by D.R. Singh on Wednesday 24 February 2016
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