क्या आप जानते हैं ? मोटापा कई स्वास्थ्य समस्याओं से जुड़ा हुआ होता है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन के एक अनुमान के अनुसार दुनिया भर में पांच साल से कम आयु के करीब दो करोड़ 20 लाख बच्चे  अपने वजन से अधिक पाए गए,जो कि विश्व के भविष्य के लिए खतरा है।विश्व स्वास्थ्य संगठनका मानना है कि समाज में तेजी से आ रहे बदलाव के कारण बचपन में मोटापा तेजी से बढ़ रहा है। बच्चों में मोटापा बढने का सीधा संबंध खानपान में स्वास्थ्यवर्धक भोजन की कमी और शारीरिक गतिविधियों के स्तर में कमी आना है लेकिन इसका प्रभाव अन्य गतिविधियों पर भी पड़ रहा है।

मोटापे के कारण बच्चों और लोगों में आत्मविश्वास में कमी, चिंता, डिप्रेशन, ईटिंग डिस्‍ऑर्डर, अकेलापन, डायबिटीज, पॉलिसिस्टिक ओवरी, हाइपोगोनैडिस्म, हाइपरटेंशन, हार्ट डिजीज, स्ट्रोक, स्लीप एपेनिया, अस्थमा, एक्सरसाइज इंटोल्रेंस,गैस्ट्रो इंटेस्टाइनल बीमारी, कब्ज, लीवर पर फैट्स जमना फ्लैट फीट इत्यादि बीमारियां प्रमुख रूप से उभर कर आ रही हैं।

इन आंकड़ों और तथ्यों से साबित हो चुका है कि मोटापा सचमुच देश के लिए और समाज के लिए आने वाले समय में बड़ा खतरा बन सकता है। इसको रोकने के लिए लोगों को अपनी जीवनशैली में परिवर्तन कर व्यायाम और शारीरिक सक्रियता को अपने जीवन में शामिल करना बेहद जरूरी है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इसके लिए पूरी दुनिया की सभ्यता के तेजी से पश्चिमीकरण को जिम्मेदार ठहराते हुए मोटापे को वैश्विक महामारी की संज्ञा दी है। इंग्लैंड में हुए अध्ययनों से जाहिर है कि नए दौर की जीवनशैली मोटापे का सबसे बड़ा कारण है। आपाधापी के इस दौर में शारीरिक श्रम लगातार घटता जा रहा है। बीस साल पहले तक इंग्लैंड का एक आम आदमी एक साल में 255 मील पैदल चलता था, जबकि अब यह दूरी घटकर 189 मील रह गई है। साइकिल चलाने के स्तर में पिछले 50 वर्षो में वहां 80 प्रतिशत की कमी आई। स्कूल जाने के लिए तो अब एक फीसदी से कम बच्चे साइकिल का इस्तेमाल करते हैं। स्कूली बच्चों में वहां मोटापा बढ़ने के जो कारण गिनाए जा रहे हैं उनमें भोजन का अस्वास्थ्यकर होना, जंक फूड के आक्रामक विज्ञापन अभियान और कंप्यूटर गेम प्रमुख हैं। ध्यान रहे, भारत के बच्चे भी अब इन कारणों से अछूते नहीं रह गए हैं।

इसके अलावा मोटापा बढ़ने का एक कारण आनुवंशिकता भी है। नई खोजों से पता चला है कि कुछ लोग आनुवंशिक रूप से मोटे होने के लिए मजबूर होते हैं। एक खास जीन मोटापा बढ़ने का कारण बन सकता है। जीएडी टू नामक यह जीन कुछ ऐसे रसायनों का उत्पादन बड़ी तेजी से करता है, जिनके कारण भूख बहुत अधिक लगती है। भूख लगने पर हर शख्स खाने की ओर दौड़ता है और यही मोटापे की वजह बन जाती है।

फिलहाल विश्व में 250 मिलियन लोग मोटापे के शिकार हैं और सामान्य से अधिक वजन वालों की संख्या तो इससे भी अधिक है। अमेरिका में हर साल तीन लाख लोगों की मृत्यु केवल मोटापे के कारण होती है। मोटापे के चलते होने वाली बीमारियों को देखते हुए विश्व स्वास्थ्य संगठन इसे जनस्वास्थ्य के लिए बड़ा खतरा बता रहा है। इस खतरे से निबटने के लिए वह पक्के इंतजाम करना चाहता है और इसी के तहत दुनिया के कई देशों में अभियान भी चलाए जा रहे हैं। अमेरिका के राष्ट्रीय स्वास्थ्य कार्यक्रम के लिए यह लक्ष्य तय किया गया है कि सन 2010 तक ऐसे लोगों की संख्या में भारी वृद्धि करनी है जो प्रतिदिन कम से कम आधे घंटे शारीरिक श्रम करें। इंग्लैंड और फ्रांस में भी ऐसे कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं और यह सब मोटापे को नियंत्रित करने के लिए ही है।

तेज़ी से विकास की राह पर आगे बढ़ रहे देशों में पिछले कुछ दशकों में प्रति व्यक्ति आय दर से भी ज़्यादा तेज़ी से मोटापे के शिकार लोगों की गिनती बढ़ रही है। एक अनुमान के हिसाब से चीन में 10 करोड़ लोग मोटापे के शिकार हैं। वहीं ब्राज़ील में बड़ों के मुकाबले बच्चे ज़्यादा तेज़ी से मोटापे का शिकार हो रहे हैं। एक अध्ययन के मुताबिक ब्राज़ील में 5 से 9 साल तक की आयु के 16 प्रतिशत लड़के और 12 प्रतिशत लड़कियां मोटापे का शिकार हैं। अमरीका की तरह ही मौक्सिको में हर सात में से एक व्यक्ति मोटापे का शिकार है। भारत का भी कुछ ऐसा ही हाल है। 

 

देखिये इस समस्या से निजात पाने का कोई सीधा सा जवाब नहीं है, लेकिन हां विश्वस्तर पर तेजी से बढ़ती जा रही इस समस्या के लिए की मायनों में सामाजिक सुधार की ज़रूरत है। जिसमें मोटापे की इस समस्या के खिलाफ़ न सिर्फ स्वस्थ्य से संबंधित कदम उठाने होंगे, बल्कि इसके प्रति जुड़ी शर्म की हीन भावना को मिटाते हुए मनोवैज्ञानिक तौर पर भी इसका इलाज करना होगा।

 

 

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Posted by D.R. Singh on Wednesday 26 December 2018
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